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अंतरराष्ट्रीय गैस पाइपलाइन

-अमिता आपटे
“ईरान के सस्तान-बलुचिस्तान प्रांत में स्थित चाबहार बंदरगाह की पूरे तामझाम के साथ अधिस्थापना एक ऐतिहासिक घटना है। इस बंदरगाह को भारत, ईरान एवं अफगानिस्तान के सहयोग से विकसित कर रहा है। अफगानिस्तान कीं भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि वह भारत से व्यापार के लिए न केवल पाकिस्तान पर आश्रित है, बल्कि उसे पाकिस्तान की मर्जी पर बड़े पैमाने पर निर्भर रहना पड़ता है। सड़क मार्ग पाकिस्तान से गुजरता है, और पाकिस्तान अपनी मनमर्जी से कभी भी उसे बंद कर देता है, जिससे अफगानिस्तान जाने वाले और वहाँ से आने वाले मालवाहक ट्रक अनिश्चितकाल के लिए रुके रह जाते हैं।”

भारत की गैस जरूरत पर एक नजर
भारत को अपनी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए भारी ऊर्जा की आवश्यकता है। उल्लेखनीय है कि, भारत को उसकी जनसंख्या के हिसाब से प्राकृतिक ऊर्जा स्रोत उपलब्ध नहीं हैं। भारत में विश्व की 17 प्रतिशत आबादी है, लेकिन उसके पास विश्व का केवल 0.3 प्रतिशत तेल, 0.8 प्रतिशत प्राकृतिक गैस एवं 6.8 प्रतिशत कोयला है। इसलिए भारत अपने निरंतर आर्थिक विकास हेतु ऊर्जा की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिए घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संभाव्य परम्परागत एवं गैर-परम्परागत स्रोतों का इस्तेमाल करने की निरंतर कोशिश करता है।

स्वच्छ ईंधन को तवज्जो देने की भारत की नीति के कारण पिछले एक दशक में प्राकृतिक गैस की माँग तेजी से बढ़ रही है। भारत का गैस उपभोग वर्ष 2015 में 4.9 बीएनसीएफ (बिलियन क्युबिक फुट) आंका गया और उसमें 2025 तक 162% वृद्धि होकर वह 12.8 लाख बीएनसीएफ होने की संभावना है।

भारत के पास अपनी जरूरतें पूरी करने के सीमित स्रोत होने से वह आयात पर बड़े पैमाने पर निर्भर है। भारत व्यापारिक रूप से उपयुक्त, दीर्घावधि, अबाधित प्राकृतिक गैस की आपूर्ति के लिए कोशिश करता रहा है। ईरान में विश्व के सर्वाधिक 1,200 ट्रिलियन क्युबिक फुट (टीसीएफ) के प्राकृतिक गैस भंडार हैं। इसके बाद रूस (1,152 टीसीएफ), कतर (866 टीसीएफ), तुर्कमेनिस्तान (617 टीसीएफ), अमेरिका (345 टीसीएफ), सऊदी अरब (228 टीसीएफ) एवं संयुक्त अरब अमीरात (215 टीसीएफ) का नम्बर है। कतर और सऊदी अरब के साथ सीमित मात्रा में सौदों के साथ ही, भारत ईरान एवं तुर्कमेनिस्तान के साथ गैस आपूर्ति की पिछले 20 वर्षों से लगातार बातचीत कर रहा है। एलएनजी का आयात महँगा पड़ता है, लेकिन मजबूरी है और गैस का स्रोत भी बहुत दूरी पर है। पाइपलाइन के जरिए यदि गैस की आपूर्ति हो तो वह सस्ती पड़ेगी। इसलिए गैस निर्यातक देशों से भारत ने अपनी ओर से जिन गैस पाइपलाइन परियोजनाओं पर बातचीत जारी रखी है वे हैं- 1) ईरान-पाकिस्तान-भारत 2) तुर्कमेनिस्तान-अफगानिस्तान-पाकिस्तान-भारत 3) भारत-बांग्लादेश-म्यांमार 4) ओमान-भारत गहन समुद्री पाइपलाइन। लेकिन इन परियोजनाओं को सुरक्षा, सामरिकता, राजनीतिक एवं वाणिज्यिक जैसे विभिन्न जोखिमों के कारण ठण्डे बस्ते में डालना पड़ा है।

महत्त्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय गैस पाइपलाइन परियोजनाएँ
1. ईरान-पाकिस्तान- इंडिया अर्थात भारत (IPI)- ईरान-पाकिस्तान- इंडिया (IPI), जिसे शांति पाइपलाइन भी कहा जाता है, की मूल संकल्पना 1989 प्रस्तुत की गई। भारत उस समूह में 2005 में शामिल हुआ और बाद में भारत और पाकिस्तान ने प्राकृतिक गैस के लिए प्रति एमएमबीटीयू 4.93 अमेरिकी डॉलर का भाव देना मान्य किया।
ईरान-पाकिस्तान पाइपलाइन फारस की खाड़ी में स्थित ईरान के दक्षिण फारस तेल क्षेत्र से आरंभ होकर पाकिस्तान के प्रमुख शहरों कराची व मुलतान से होते हुए भारत के दिल्ली तक पहुँचनी थी। इसकी लम्बाई 1,724 मील (2,775 किमी) थी। इससे पाकिस्तान व भारत को गैस आपूर्ति में सुविधा होती। ईरान ने भी इस परियोजना की 60 प्रतिशत लागत उठाने की पेशकश की थी।
इस पाइपलाइन से 150 एमएमएससीएमडी प्राकृतिक गैस की आपूर्ति अपेक्षित थी, जिसका भारत व पाकिस्तान में समान वितरण होना था। इस गैस पाइपलाइन की वार्षिक क्षमता 40 बिलियन वर्ग मीटर थी। वर्ष 2008 में ईरान के साथ अमेरिका का नागरिक परमाणु समझौता हुआ और बाद में भारत सुरक्षा व मूल्यों की कारणों से 2009 में इस परियोजना से हट गया। लेकिन, बाद में वर्ष मार्च 2010 में भारत ने पाकिस्तान व ईरान से इस पाइपलाइन पर तेहरान में त्रिपक्षीय वार्ता का अनुरोध किया, लेकिन यह वार्ता अब तक नहीं हुई है। ईरान-पाकिस्तान-भारत पाइपलाइन या शांति पाइपलाइन भारत-पाकिस्तान के बीच भू-राजनीतिक अनिश्चितता और दुश्मनी के कारण अधर में लटकी हुई है। इसलिए पाकिस्तान को छोड़कर गहरे समुद्र से गैस पाइपलाइन लाने की कल्पना सामने आई।

2. तुर्कमेनिस्तान-अफगानिस्तान-पाकिस्तान-भारत (TAPI)- प्रस्तावित अफगानिस्तान होकर गुजरने वाली अंतरराष्ट्रीय प्राकृतिक गैस पाइपलाइन एशियाई विकास बैंक विकसित कर रहा है। बैंक ने वर्ष 2005 में व्यावहारिकता रिपोर्ट बनाई और इस परियोजना को संभव बताया। प्रस्तावित गैस पाइपलाइन तुर्कमेनिस्तान के कैस्पियन सागर से अफगानिस्तान व पाकिस्तान होकर भारत को प्राकृतिक गैस की आपूर्ति करेगी। भारत सरकार ने वर्ष 2008 में इस परियोजना को मंजूरी प्रदान की और इसमें शामिल होने वाला वह चौथा देश बन गया।

यह परियोजना वर्ष 2012 में आरंभ और 2016 में पूरी होने वाली थी। इसके अंतर्गत 1,680 किमी की पाइपलाइन बिछाई जानी थी, जिसकी कुल गैस क्षमता 90 एमएमएससीएमडी थी। योजना के अनुसार, 38 एमएससीएमडी गैस भारत और पाकिस्तान हरेक को मिलनी थी, जबकि अफगानिस्तान 14 एमएमएससीएमडी गैस लेने वाला था। अफगानिस्तान को परियोजना का 80% राजस्व मिलना था।

इस परियोजना पर वर्ष 1995 से ही बातचीत चल रही थी, और 2010 में उसे औपचारिक रूप से स्वीकार किया गया। इसके अंतर्गत अगले 30 वर्ष के लिए दक्षिण एशिया को 33 बिलियन क्युबिक मीटर गैस का संवहन करना था। सुरक्षा व वित्तीय कारणों से कई दिग्गज इस परियोजना से हट गए।

इससे पार पाने के लिए तुर्कमेंगाज़ के नेतृत्व में कंसार्शियम का गठन किया गया। तुर्कमेंगाज़ तुर्कमेनिस्तान की सरकारी और मध्य एशिया की सब से बड़ी गैस कम्पनी है। परियोजना में उसका हिस्सा 85% है। इसमें भागीदार के रूप में गैस अथॉरिटी ऑफ इंडिया , पाकिस्तान की इंटर-स्टेट गैस सिस्टम्स (प्रायवेट) लि. (ISGS) एवं अफगान गैस एंटरप्राइज शामिल हैं। इनमें से प्रत्येक का हिस्सा 5% है।

लगभग 1200 किमी पाइपलाइन तुर्कमेनिस्तान, 735 किमी पाइपलाइन अफगानिस्तान, 800 किमी पाइपलाइन पाकिस्तान से गुजरनी है, जो भारत के पंजाब राज्य में स्थित फाजिल्का में पहुँचेगी। भारत को फिलहाल गैस की अत्यंत आवश्यकता है और उसने इस पाइपलाइन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता भी जाहिर की है। यह परियोजना 8.7 बिलियन अमेरिकी डॉलर की है। वह दिसम्बर 2019 में पूरी होने की आशा है। इससे तुर्कमेनिस्तान से दक्षिण एशिया तक गैस का संवहन होगा। लेकिन, तालिबान के गढ़ से पाइपलाइन के गुजरने के कारण सुरक्षा आदि की भू-राजनीतिक दिक्कतें हैं। कई निवेशकों की रुचि इसमें घटती जा रही है। पाइपलाइन की इस परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए तुर्कमेनिस्तान के उपप्रधानमंत्री एवं विदेश मंत्री रशीद मेरेदोव और भारतीय पेट्रोलियम एवं गैस मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के बीच हाल में हुई बैठक से कुछ सकारात्मक संकेत दिखाई दे रहे हैं।

3.मध्य पूर्व-भारत के बीच गहरे समुद्र में गैस पाइपलाइन की परियोजना- भारतीय बाजार में प्राकृतिक गैस पहुँचाने के लिए सिद्धोमल समूह की साउथ एशिया गैस एंटरप्राइज (SAGE) ने मध्य पूर्व से समुद्र में पाइपलाइन बिछाने में सहयोग की पेशकश की है। इसके लिए व्यावहारिकता रिपोर्ट बनाई जा रही है। समुद्र में 3400 मीटर नीचे से यह 1400 किमी की पाइपलाइन ईरान (चाबहार बंदरगाह) से शुरू होगी और खाड़ी क्षेत्र (ओमानी समुद्र) से होते हुए भारतीय तट पर गुजरात में पहुँचेगी, जिसे बाद में मुंबई तक बढ़ाया जाएगा।
समुद्र के भीतर से प्रस्तावित इस परियोजना के अनुसार, पाकिस्तान के विशेष आर्थिक क्षेत्र (Exclusive Economic Zone) को टालकर यह 1400 किमी की पाइपलाइन बिछाएगी। उससे प्रति दिन 31.5 मिलियन क्युबिक मीटर की गैस का संवहन होगा और अंतिम मंजूरी के बाद दो वर्षों में वह बिछा दी जाएगी। इस पर फिलहाल ईरान और SAGE के बीच वार्ताएँ चल रही हैं।
इस पाइपलाइन के जरिए मध्य पूर्व का गैस क्षेत्र भारत से जुड़ जाएगा। यह पाइपलाइन अरब सागर में 3400 मीटर गहराई में बिछाई जाएगी तथ इसकी लम्बाई 1300 किमी होगी। इससे अगले 20 वर्षों में भारतीय बाजारों में 1.1 बीएससीईडी अर्थात 8 टीसीएफ गैस पहुँचेगी।
वर्ष 2017 की स्थिति के अनुसार इस परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए ओमान, ईरान और भारत के बीच न्यूयॉर्क में त्रिपक्षीय बातचीत हो चुकी है।

4.म्यांमार, बांग्लादेश व भारत पाइपलाइन परियोजना
पिछले एक दशक में अधूरी रही महत्त्वाकांक्षी गैस पाइपलाइन परियोजना पर बांग्लादेश और म्यांमार के साथ भारत ने पुनः बातचीत शुरू की गई है। बांग्लादेश और म्यांमार इस त्रिपक्षीय पाइपलाइन पर अब पुनर्विचार कर रहे हैं।
तीनों देशों के उपयोग की दृष्टि से प्रस्तावित यह अंतरराष्ट्रीय गैस पाइपलाइन 7,000 किमी की होगी। दो वर्ष पूर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद के साथ इस विषय पर बातचीत हुई है। GAIL. ONGC एवं बांग्लादेश पेट्रोलियम कार्पोरेशनके अधिकारियों के बीच आरंभिक वार्ता भी हो चुकी है।
भारत ने पिछले दशक के मध्य में इस अंतरराष्ट्रीय पाइपलाइन की पेशकश की थी। म्यांमार के तेल क्षेत्र में भारतीय कम्पनियों द्वारा गैस निकालने के बाद उसे इस पाइपलाइन के जरिए भेजने का प्रस्ताव था। ढाका की तत्कालीन सरकार ने इस पेशकश को स्वीकार नहीं किया। लेकिन, वहाँ सरकार बदलने और भारत-बांग्लादेश के अच्छे रिश्तें बन जाने के बाद भारत ने इस चर्चित अंतरराष्ट्रीय गैस पाइपलाइन पर बल देना आरंभ किया।

“भारत ईरानी बंदरगाह का परिचालन करेगा-

भारत और ईरान के बीच हस्ताक्षरित सहमति-पत्र के अनुसार, भारत चाबहार प्रथम चरण में दो बर्थों का निर्माण एवं परिचालन करेगा, जिस पर 85.21 मिलियन अमेरिकी डॉलर का पूँजीगत निवेश तथा 22.95 मिलियन अमेरिकी डॉलर का वार्षिक राजस्व परिव्यय होगा। यह 10 वर्ष की लीज पर होगा।

10 वर्ष अथवा विस्तारित अवधि पूर्ण होने के बाद समझौते के अनुसार संसाधनों का स्वामित्व ईरानी पक्ष को सौंपना होगा। समझौते के तहत ईरानी पक्ष ने 150 मिलियन अमेरिकी डॉलर की ॠण-सुविधा का अनुरोध किया है।

चाबहार बंदरगाह की क्षमता में धीरे-धीरे विस्तार के बाद पाकिस्तान को टालकर भारतीय वस्तुओं को अफगानिस्तान एवं मध्य एशियाई देशों को भेजा जा सकेगा। विस्तार के बाद बंदरगाह की वार्षिक माल ढुलाई क्षमता 8.5 मिलियन टन हो जाएगी।”

अंतरराष्ट्रीय गैस पाइपलाइन के लिए अगले कदम क्या हो?
अंतरराष्ट्रीय स्तर की विशाल परियोजनाओं के लिए सम्बंधित देशों के बीच अच्छे सामरिक एवं विदेशी रिश्तों की जरूरत होती है। इसके अलावा, घरेलू कर, नियमन एवं सब्सिडी नीतियों या ॠण नीतियों पर भी गौर करना होता है। अतः सरकार का स्थैर्य और प्रभुता परियोजना के जोखिम घटकों में महत्त्वपूर्ण होते हैं। पथरीले प्रदेश की समस्या तो हल की जा सकती है, लेकिन विभिन्न देशों की भू-राजनीतिक समस्याएँ पाइपलाइन परियोजनाओं में मुख्य अवरोध होती हैं। अंतरराष्ट्रीय व्यापार और निवेश के लिए सुस्पष्ट, सुसंगत और सौहार्द्रपूर्ण ऊर्जा नीतियाँ, समर्थक कानूनी एवं नियमन संरचना की आवश्यकता होती है।

पिछले तीन वर्षों से तेल व गैस क्षेत्र की मूल्य शृंखला में निवेश नहीं हो रहा है। दूसरी बात यह कि, अंतरराष्ट्रीय पाइपलाइन परियोजनाओं का विकास अंतरराष्ट्रीय दिग्गजों के प्रभाव पर निर्भर करता है। यही नहीं, सम्बंधित देशों की भू-राजनीतिक स्थिति अंतरराष्ट्रीय पाइपलाइन परियोजनाओं के निर्माण एवं परिचालन के चरणों में सुरक्षा और प्रतिरक्षा की समस्याएँ उत्पन्न करती हैं। अंत में, पेट्रोलियन आयात समाप्त कर वैकल्पिक ऊर्जा का इस्तेमाल करने के लिए भारत की ऊर्जा नीति में किया गया परिवर्तन भी अंतरराष्ट्रीय पाइपलाइन परियोजनाओं के लिए दिक्कत है; क्योंकि भारत अब मीथेन और एथनॉल तथा सौर ऊर्जा पर आधारित वैकल्पिक ऊर्जा से अपने परिवहन क्षेत्र को सन्नद्ध करना चाहता है। आगामी दशकों में अंतरराष्ट्रीय गैस पाइपलाइन परियोजनाओं में अत्यल्प विकास की संभावना दिखाई दे रही है।
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