लेख

BBIN क्षेत्र पर एक गूढ़ दृष्टि

‘दक्षिण एशिया उपमहाद्वीप भारत, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, बांग्लादेश और मालदीव-इन सात देशों से बना है। साउथ एशियन असोसििएशन फॉर रीजनल कोआपरेशन (SAARC) 1834 में परस्पर सहयोग के जरिए इन देशों के आर्थिक विकास के लक्ष्य हो हासिल करने के लिए बनाया गया था। शुरुआती दिनों में दक्षिण एशियाई उपमहाद्वीप एक ही क्षेत्र था। पर जब राजनीतिक बंटवारा हुआ तो नये देश बन गए।’

सार-संक्षेप

BBIN क्षेत्र-जो-भारत, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, बांग्लादेश और मालदीव को मिलाकर बना है-उप क्षेत्रीय सहयोग की प्रणाली है। इस प्रणाली का उद्देश्य है परस्पर सहयोग के जरिए आर्थिक‌ विकास, क्षेत्र में संपर्कता जिसका मूल है। इस प्रणाली के तहत सड़क, रेलवे नेटवर्क और बंदरगाहों को एक-दूसरे से जोड़कर उस संपर्कता के माध्यम से आर्थिक विकास हासिल करना है। इस प्रणाली का निर्माण इस तरह किया गया है कि दक्षिण एशिया उप क्षेत्र में, इन सभी चार देशों में सभी स्तरों पर निकट संपर्क कायम किया जा सके। यह एक नया मॉडल है।

BBIN कॉरीडोर भारत, नेपाल, भूटान, श्रीलंका और बांग्लादेश के बीच आर्थिक सहयोग और संपर्कता से जुड़ी उप क्षेत्रीय प्रणाली है। भूटान और नेपाल-जो ‘लैंड लॉक्ड’ देश हैं-BBIN से सबसे अधिक लाभान्वित होंगे। यह कॉरीडोर सभी BBIN देशों में आर्थिक, सांस्कृतिक और बड़े पैमाने पर संपर्कता बढ़ाने में निश्चित रूप से सफल सिद्ध होगा, जिससे आपसी सहयोग को भारी बढ़ावा मिलेगा। चूंकि BBIN क्षेत्र की अवधारणा संपर्कता के जरिए वास्तविकता में परिणत होने जा रही है, इसलिए चारों देशों द्वारा 2015 में हस्ताक्षरित मोटर वीइकिल समझौता BBIN क्षेत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस समझौते से लोगों के आपसी संबंध बढ़ने के साथ माल, वाहनों और लोगों का अंतर्देशीय परिवहन भी बढ़ेगा। परिणामस्वरूप, आर्थिक लेन-देन और व्पापार भी कई गुणा बढ़ जाएगा। इस तरह का क्षेत्र कायम करने के विचार को अमली जामा पहिनाना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। अगर दृढ़ इच्छा शक्ति हो तो इसे हासिल किया जा सकता है। इस सबंध में भारत को पहल करने की जरूरत है।

‘BBIN के अंतर्गत यात्री और माल परिवहन की आसानी’

भारत ने नेपाल, भूटान, श्रीलंका और बांग्लादेश के साथ संपर्कता के लिए 558 किलोमीटर सड़क के निर्माण व उन्हें उन्नत बनाने और यात्रियों व सामान की आवा-जाही को सरल बनाने के लिए 1.04 अरब डॉलर की महत्वपूर्ण परियोजना को मंजूरी दी है। यह अंतर-क्षेत्रीय व्यापार को 60 प्रतिशत बढ़ाने की एक बड़ी योजना का हिस्सा है। भारत के आर्थिक मामलों के विभाग ने एशियाई विकास बैंक द्वारा 50 फीसदी वित्तपोषण की मंजूरी के साथ इस योजना को अपनी अधिकारि स्वीकृति दे दी है। भारत की तरफ फिलहाल, पश्चिम बंगाल और मणिपुर इस परियोजना का अंग हैं। इसे अगले दो वर्षों के भीतर पूर्ण करने का लक्ष्य है। परियोजना के अतर्गत अन्य योजनाओं क़े साथ सिलिगुड़ी-मिरक-दार्जिलिंग का उन्नतीकरण (डेढ़ करोड़ डॉलर) और बांग्लादेश सीमा पर 60 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्ग-35 (कोलकाता-बंगान) का चौड़ीकरण (13 करोड़ डॉलर) शामिल है। इसमें कोलकाता की बाहरी सीमा पर डॉयमंड हॉर्बर को जोड़ने वाली 25 करोड़ डॉलर लागत से नई 123 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण भी शामिल है। इसके अलावा मणिपुर में दो राजमार्ग आ रहे हैं-115 किलोमीटर लंबा उखरुल-तोलोई-ताडूबी (23 करोड़ डॉलर) और राष्ट्रीय राजमार्ग -39 पर 138 किलोमीटर लंबी विभाजित चार लेन वाला कोहिमा-केडिमा क्रिंग-इंफाल सेक्शन (28 करोड़ डॉलर)। इसके अलावा विस्तृत BBIN सड़क पहल के तहत एक अरब डॉलर की परियोजना के अंतर्गत मणिपुर के इंफाल-मोरे सेक्शन में एक 600 मीटर लंबे पुल और 110 किलोमीटर लंबी सड़क की योजना भी बनाई जा रही है।

भूमिका

दक्षिण एशिया उपमहाद्वीप भारत, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, बांग्लादेश और मालदीव-इन सात देशों से बना है। साउथ एशियन असोसिाएशन फॉर रीजनल कोआपरेशन (SAARC) 1834 में परस्पर सहयोग के जरिए इन देशों के आर्थिक विकास के लक्ष्य को हासिल करने के लिए बनाया गया था। शुरुआती दिनों में दक्षिण एशियाई उपमहाद्वीप एक ही क्षेत्र था। पर जब राजनीतिक बंटवारा हुआ तो नये देश बन गए। म्यांमार भारत से 1935 में अलग हुआ। 1947 में उपमहाद्वीप में दूसरा बंटवारा हुआ, जब भारत और पाकिस्तान अलग-अलग देश बन गए। 1971 में बांग्लादेश पाकिस्तान से अलग होकर स्वतंत्र देश बन गया। हालांकि ये स्वतंत्र देश हैं, पर उनके नागरिकों की आर्थिक और सामाजिक समस्याएं वही हैं।

आबादी का ‌विस्फोट, सामाजिक पिछड़ापन, गरीबी, बेरोजगारी, भुखमरी, जीवन स्तर में विभेद, महिलाओं के विरुद्ध अत्याचार, कुपोषण इन देशों की समस्याओं की प्रकृति एक ही जैसी है। सब-सहारा अफ़्रीका के बाद दक्षिण एशिया विश्व का दूसरा सबसे पिछड़ा क्षेत्र है। घना बसा होने के बावजूद इसका कम विकास हुआ है। SAARC का गठन इस उद्देश्य को लेकर किया गया था कि उसके साथ सदस्य देश द्विपक्षीय राजनीतिक मामलों से ऊपर उठें और अपने सामने मौजूद एक जैसी समस्याओं का समाधान करें और एक जैसे लक्ष्य हासिल करें।

SAARC की विफलता के कारण

पिछले 34 वर्षों में, 1984 से 2018 तक SAARC ने अपनी यात्रा बहुत धीमी गति से तय की है। SAARC के शिखर सम्मेलनों को हर वर्ष होना चाहितए, पर सचाई यह है कि अभी तक केवल 19 शिखर सम्मेलन हो पाए हैं। इसके पीछे तीन कारण हैंः

  • SAARC के सदस्य देशों में केवल भारत और पाकिस्तान ऐसे हैं जो भौगोलिक रूप से बड़े होने के साथ आर्थिक रूप से भी मजबूत हैं। आपसी विश्वास के अभाव में राजनीतिक झगड़ों के चलते ये दोनों विशाल देश एक-दूसरे के खिलाफ कमर कसे रहते हैं। इन झगड़ों और तनावों की वजह से बाधाएं पैदा होती हैं और SAARC द्वारा किए गए निर्णयों को लागू करने में मुश्किलें पेश आती हैं।
  • अर्थव्यवस्था का आकार हो या भौगोलिक विस्तार भारत SAARC देशों में सबसे बड़ा देश है। इस कारण उपमहाद्वीप में, खासकर SAARC के सदस्य देशों में भारत को लेकर छिपा हुआ डर है। SAARC के सदस्य देशों का जितना कुल भौगोलिक आकार है उसका 70 प्रतिशत अकेले भारत का है। दक्षिण एशिया उपमहाद्वीप में भारत को ‘बड़ा भाई’ के रूप में देखा जाता है। SAARC के सदस्य देशों को लगता है कि अगर भारत जैसे बड़े देश के‌ लिए उनकी अर्थव्यवस्था खुली तो उनका स्वदेशी व्यापार और उद्योग नष्ट हो जाएंगे। मिसाल के तौर पर, बांग्लादेश का विशाल मात्रा में जूट का उत्पादक है। उसी तरह भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में भी जूट का बड़े परिमाण में उत्पादन होता है। यही हालत चाय के उत्पादन के मामले में भी है। पाकिस्तान और बांग्लादेश जहां बड़ी मात्रा में चीनी का उत्पादन करते हैं वहीं भारत भी पर्याप्त मात्रा में इसका उत्पादक है। परिणामस्वरूप, गलत सही, पर इन देशों में छिपी हुई भावना है कि अगर वे अपनी अर्थव्यवस्था को खोल देंगे तो भारत द्वारा उत्पादित सामान और उत्पाद उनके यहां पहुंचकर, उनके बाजारों में पूरी तरह छा जाएंगे।
  • भारत और पाकिस्तान को छोड़कर SAARC के इन पांच सदस्य देशों ने अपने संसाधन विकसित नहीं किए हैं, जो व्यापार बढ़ाने के लिए आवश्यक कहलाएं। इन देनों में संपर्कता भी ज्यादा विकसित हो पाई है। भारत और पाकिस्तान के बीच विमान उड़ानों की बारंबारता भी सप्ताह में महज एक बार है। भारत और बांग्लादेश में साझी सीमारेखा 4000 किलोमीटर तक फैली है। इन दोनों देशों के बीच 60 फीसदी व्पापार समुद्र के रास्ते होता है। इसका मतलब यह है कि यहां भूसंसाधन ठीक से विकसित नहीं हुए हैं। नेपाल और भूटान ‘लैंडलॉक्ड’ देश हैं। उनके पास कोई समुद्री किनारा नहीं है। भारत और चीन जैसे विशाल देश उनके पड़ोसी हैं। इन देशों को भारत और चीन से जोड़ने वाले संसाधन भी ज्यादा विकसित नहीं हुए हैं। कुछ हद तक नेपाल जरूर बस सेवाओं से जुड़ा हुआ है। पर अन्य देशों के साथ ऐसी संपर्कता नहीं विकसित हो पाई है। स्रोतों की इस संपर्कता का अभाव SAARC के सदस्य देशों की एक बड़ी कमजोरी है। SAARC के सदस्य देशों का पारस्परिक व्पापार भी नाम मात्र के बराबर है-केवल 25 अरब डॉलर के बराबर जो विश्व के अन्य देशों के साथ होने वाले कुल वार्षिक कारोबार के 0.6 प्रतिशत जितना है। इसके विपरीत असोसिएशन ऑफ साउथईस्ट एशियन नेशंस (ASEAN)-जो दक्षिण-पूर्व एशिया में दूसरा सबसे बड़ा क्षेत्रीय समूह है और लगभग SAARC के ही जमाने का है-अपने दस सदस्यों के बीच आर्थिक, राजनीतिक और सुरक्षा सहयोग को बढ़ावा देता है। पर, ASEAN के दस सदस्यों का पारस्परिक व्यापार 250 अरब डॉलर के करीब है, जो विश्व भर में होने वाले व्यापार के 30 प्रतिशत के करीब है। ASEAN देशों में व्यापारिक गतिविधियां जिस तरह दिन-दूनी, रात-चौगुनी के रफ्तार से बढ़ी हैं उस तरह SAARC देशों में नहीं बढ़ पाई हैं।

‘जनादेश है कि इस परियोजना को अगले दो वर्ष के भीतर पूरा कर लिया जाए। परियोजना के अतर्गत अन्य योजनाओं क़े साथ सिलिगुड़ी-मिरक-दार्जिलिंग का उन्नतीकरण (डेढ़ करोड़ डॉलर) और बांग्लादेश सीमा पर 60 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्ग-35 (कोलकाता-बंगान) का चौड़ीकरण (13 करोड़ डॉलर) शामिल है। इसमें कोलकाता की बाहरी सीमा पर डॉयमंड हॉर्बर को जोड़ने वाली 25 करोड़ डॉलर लागत से नई 123 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण भी शामिल है। इसके अलावा मणिपुर में दो राजमार्ग आ रहे हैं-115 किलोमीटर लंबा उखरुल-तोलोई-ताडूबी (23 करोड़ डॉलर) और राष्ट्रीय राजमार्ग -39 पर 138 किलोमीटर लंबी विभाजित चार लेन वाला कोहिमा-केडिमा क्रिंग-इंफाल सेक्शन (28 करोड़ डॉलर)। इसके अलावा विस्तृत BBIN सड़क पहल के तहत एक अरब डॉलर की परियोजना के अंतर्गत मणिपुर के इंफाल-मोरे सेक्शन में एक 600 मीटर लंबे पुल और 110 किलोमीटर लंबी सड़क की योजना भी बनाई जा रही है।’

SAARC ने 1994 में व्यापार और संपर्कता बढ़ाने के लिए साउथ एशियन प्रिफरेंशियल ट्रेड एग्रीमेंट (SAPTA) किया था। बाद में 2004 में साउथ एशियन फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर ही हस्ताक्षर हुए। इन दोनों समझौतों पर इस लिए अमल नहीं हो पाया क्योंकि SAARC के हर सदस्य देश ने सामान व उत्पादों के आयात-निर्यात पर भारी कर लगा रखे थे। करों के इस बोझ के कारण बगैर परेशानियों के व्यापार संभव नहीं था। इसके अलावा SAARC के सदस्य देशों के बीच स्रोतों के विकास के लिए संचार नेटवर्क भी परस्पर विश्वास के अभाव के कारण विकसित नहीं किया जा सका। इस दिशा में जो प्रयास हुए उन्हें विफल करने में पाकिस्तान की विशेष भूमिका थी। भारत हालांकि SAARC का उसके गठन के समय से ही सदस्य रहा है, पर शुरू में उसकी आर्थिक स्थिति आज जैसी मजबूत नहीं थी। इसलिए वह न तो जरूरी आर्थिक स्रोत उपलब्ध करा पाया, न ही नेतृत्व के लिए जरूरी पहल कर सका। इससे SAARC की प्रगति में बाधाएं पैदा हुईं।

ASEAN और यूरोपियन यूनियन जैसे संगठनों को कभी भी उस तरह की समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ा, जैसा कि SAARC को। ये बाधाएं केवल दक्षिण एशिया और SAARC के मामले में देखी जा रही हैं। इसलिए SAARC के गठन के बावजूद इन देशों की आर्थिक स्थितियों में कोई फर्क देखने को नहीं आया है। जिस उद्देश्य के साथ SAARC की स्थापना की गई थी वहीं विफल हो गया है।

SAARC की विफलता के लिए एक और कारण जिम्मेदार है। यूरोपियन यूनियन और ASEAN के मामले में इन दोनों संगठनों के सदस्य राष्ट्र शुरू में अलग देश थे, जो बाद में साथ आए और ये संगठन बना लिये। इसके विपरीत दक्षिण एशिया उपमहाद्वीप पहले एक एकीकृत उपमहाद्वीप था और स्वयूंभ राष्ट्रों की कोई सीमारेखा उसपर अंकित नहीं थी। स्वतंत्र स्वंभू देश बाद में अस्तित्व में आए। ये देश अब SAARC के माध्यम से एक साथ आने की कोशिश कर रहे हैं। इस तरह का घटनाक्रम किसी अन्य महाद्वीप में नहीं देखा गया। अलगाव के बाद एक साथ आना बहुत ही कठिन प्रक्रिया है। SAARC इन्हीं कठिनाइयों का सामना कर रहा है। ASEAN और यूरोपियन यूनियन के गठन के निश्चित प्रावधान हैं। इन प्रावधानों के अनुसार यदि किसी मुद्दे को लेकर दो देशों के बीच कोई विवाद है तो बाकी सभी देश उसके समाधान के लिए पहल करेंगे। संक्षेप में सभी देश मिलकर द्विपक्षीय मुद्दे का हल निकालेंगे। SAARC के संविधान में इस तरह का कोई प्रावधान नहीं है। नतीजतन, अगर किसी मुद्दे को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच कोई विवाद है तो SAARC के अन्य सदस्य देश मिल्कर SAARC के मंच का राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा के लिए नहीं कर सकते। केवल SAARC का मंच ही इस मुद्दों पर विचार कर सकता है। उदाहरण के लिए, वियतनाम और चीन का द्विपक्षीय विवाद ASEAN द्वारा उपलब्ध कराए गए मंच पर विचार का विषय हो सकता है, पर SAARC में नहीं। SAARC की प्रगति में यही प्रतिबंध बड़ा रोड़ा बना हुआ है। SAARC का गठन आर्थिक हित के मुद्दों को सुलझाने और व्यापार और वाणिज्य में वृद्धि के लिए किया गया था, पर उसकेसदस्य देशों के राजनीतिक हितों को ज्यादा महत्व दिया जा रहा है। परिणामस्वरूप, सदस्य देश एक-दूसरे के साथ कोई सहयोग नहीं कर रहे।

2014 में काठमांडु में संपन्न 18वें SAARC सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहल की थी और सदस्य देशों के बीच संपर्कता विकसित करने की जरूरत पर जोर दिया था। सड़कों, रेलवे लाइनों और हवाई मार्ग से सदस्य देशों के बीच संपर्कता विकसित करने की जरूरत बहुत महत्वपूर्ण है। पर, हमेशा की तरह पाकिस्तान ने इसका विरोध किया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उठाया मुद्दा ठंडे बस्ते में चला गया।

यह उसी समय की बात है जब उपक्षेत्रीय व्यवस्था विकसित करने का ‌विचार भारत को आया था। दिलचस्प बात यह कि उपक्षेत्रीय व्यवस्था विकसित करने का ‌यह विचार SAARC के मंच पर ही रखा गया था। इस उपक्षेत्रीय व्यवस्था को BBIN कॉरीडोर कहा जाता है। यह उपक्षेत्रीय सहयोग व्यवस्था है, जिसका विचार 2014 में आया था। यह उपक्षेत्रीय व्यवस्था SAARC के ही मौजूदा व्यापार और वाणिज्य संगठन के अंतर्गत विकसित की गई है। SAARC के संविधान के अंतर्गत इस प्रकृति के उपक्षेत्रीय संगठन की अनुमति है। भारत ने इसी प्रावधान के अंतर्गत महत्वपूर्ण निर्णय लेकर इसपर अमल किया है।

BBIN जोन के लाभ

BBIN जोन भारत, बांग्लादेश, भूटान और नेपाल-इन चारों सदस्य देशों के लिए लाभकारी होगा। खासकर, भूटान और नेपाल को। ‘लैंडलॉक्ड’ होने के कारण देशों को अपने यहां उत्पादित सामानों और उत्पादों के लिए कोई बाजार उपलब्ध नहीं है। BBIN के कारण उन्हें भारत के रूप में बाजार में एक बड़ा बाजार मिल जाएगा।
BBIN कॉरीडोर सदस्य देशों को कई लाभ प्रदान करेगा। इनमें कुछ महत्वपूर्ण लाभ इस प्रकार हैंः

  • सामान का विनिमय और व्यापार सरल हो जाएगा।
  • BBIN ने ‘लोगों से लोगों तक’ संपर्क बढ़ेगा। इससे लोग एक-दूसरे से जुड़ेंगे।
  • उपक्षेत्रीय संगठन से भारत को भी लाभ होगा। बुनियादी आधारभूत ढांचे के अभाव में भारत अपने पूर्वोत्तर राज्यों का विकास कर पाने में कामयाब नहीं हो बाया है। यदि BBIN के अंतर्गत सड़कों और पुलों का नेटवर्क बनता है तो इससे भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को लाभ होगा। उदाहरण के लिए, यदि कॉरीडोर का काम सफलता से पूरा होता है तो पूर्वोत्तर राज्यों और कोलकाता बंदरगाह की दूरी हजारों किलोमीटर कम हो जाएगी। इसके अलावा भारत के पूर्वोत्तर राज्य बांग्लादेश बांग्लादेश के आशूगंज बंदरगाह, चटगांव बंदरगाह और मोंगला बंदरगाह का भी उपयोग कर पाएंगे।
  • BBIN कॉरीडोर के जरिए नेपाल और भूटान बांग्लादेश के साथ आसानी से वैसे ही व्यापार कर पाएंगे, जैसा वे भारत के साथ करते हैं।
  • BBIN कॉरीडोर से एक-दूसरे के यहां पर्यटन को प्रोत्साहन मिलेगा।
  • BBIN कॉरीडोर से बिजली, सेहत और शिक्षा जैसे विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग सुविधापूर्ण बनेगा।

BBIN कॉरीडोर का इतिहास

BBIN कॉरीडोर को वास्तविकता में बदलने के लिए पहले कदम 15 जून, 2015 को उठाए गए थे। भारत, बांग्लादेश, भूटान और नेपाल-इन चार देशों ने इसी दिन इस महत्वपूर्ण समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। यह समझौता मोटर वाहन समझौता कहलता है। BBIN कॉरीडोर के विचार की इसे पहली बड़ी कामयाबी कहा जा सकता है। समझौते के तहत एशियाई विकास बैंक चारों देशों में सड़कों के विकास के लिए धन प्रदान करेगा। इन सड़को के विका के कारण सभी चारों देशों को बाजार उपलब्ध हो सकेगा।

इस व्यवस्था को कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। यह बात ध्यान देने की है कि केवल सड़के विकसित करने से इन देशों के बीच व्यापार और वाणिज्य की वृद्धि नहीं होगी। इस उद्देश्य के लिए माल के विनिमय और परिवहन पर लगने वाली चुंगी, जैसे करों में कमी करना भी महत्वपूर्ण है।

BBIN क्षेत्र की भारत के लिए अहमियत

BBIN के माध्यम से उन सभी उद्देश्यों को तो हासिल किया ही जा सकेगा, जो SAARC की विफलता के कारण अभी तक प्राप्त नहीं किए जा सके, ‌इससे कुछ अतिरिक्त लाभ भी होंगे। चीन ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘वन बेल्ट वन रोड प्रॉजेक्ट (OBOR) शुरू किया है। OBOR के अंतर्गत सड़क और रेल संपर्कता के रूप में बढ़ी संपर्कता का उपयोग वह अपने व्यापार और वाणिज्य को बढ़ाने के लिए करना चाहता है। चीन ने इसके अलावा अपनी चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरीडोर परियोजना भी शुरू की है, जिसके अंतर्गत उसने पाकिस्तान में 42 अरब डॉलर का‌ निवेश किया है। इसके अंतर्गत भी सड़क और रेलवे लाइनों सहित आधारभूत ढांचे का निर्माण किया जाएगा। पड़ोसी देश जब इस तरह के कदम उठा रहा हो भारत के लिए भी पहल करना महत्वपूर्ण है। भारत की ‘लुक ईस्ट’ नीति उसे BBIN की ओर तेजी से ले जाएगी, क्योंकि बांग्लादेश की मदद से पूर्वोत्तर राज्यों में आधारभूत ढांचे का निर्माण किया जाएगा। यही कॉरीडोर म्यांमार और थाईलैंड तक बढ़ाया जा सकता है। इसलिए सड़क का विकास बहुत महत्वपूर्ण है।

BBIN क्षेत्र की चुनौतियां

BBIN क्षेत्र के सामने कई चुनौतियां हैं। इस क्षेत्र के बाकी तीनों देशों को भारत के भौगोलिक विस्तार और उसकी अर्थव्यवस्था के आकार को लेकर भारत के प्रति‌ छिपा हुआ एक डर है। इसी वजह से विश्वास की कमी भी है। विश्वास की इस कमी को दूर करने के लिए विशेष ध्यान देने की जरूरत है। SAARC की स्थापना के समय भारत आर्थिक रूप से मजबूत नहीं था। पर आज भारत आर्थिक रूप से SAARC का नेतृत्व करने का प्रयास कर रहा है। 1996 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल के कार्यकाल में भारत ने ‘गैर आदान-प्रदान का सिद्धांत’ बनाया था, जिसके तहत उसकी नीति बगैर किसी प्रतिफल के दक्षिण एशियाई देशों की मदद करने की थी। भारत इसी नीति के तहत SAARC देशों की भी मदद कर रहा है। इसका विश्वास की कमी को दूर करने में उपयोग किया जा सकता है। वस्तुओं के आयात में लगने वाली ड्यूटी और करों को कम करने पर भी विचार किया जाना चाहितए। भूटान जैसे देशों को यह छिपा हुआ डर है कि अगर BBIN कॉरीडोर विकसित किया जाएगा तो विभिन्न देशों में उत्पादित सामान उसके यहां पहुंचकर उसके देशी उद्योगों को नुकसान पहुंचाएंगे। भारत छोटे देशों की चिंिताओं से पैदा चुनौतियों का भी सामना कर रहा है। संक्षेप में इन चुनौतियों को दूर करने में भारत की पहल भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितना इस कॉरीडोर का विकास स्वयं है।

– डॉ. शैलेंद्र देवलंकर

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