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संपर्कताः अवसर और चुनौती

‘भारत एक अहम दौर से गुजर रहा है। 1991 में भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था के द्वार खोले और एक के बाद एक कई आर्थिक उपलब्धियां हासिल कीं। विश्व पटल पर आज भारत को ‘हाथी’ की उपमा दी जाती है। लोकतांत्रिक देश होने के नाते , भारत में रायशुमारी बहुत महत्ता रखती है। इसके कारण निर्णय की प्रक्रिया में असामान्य समय लग जाया करता है। चीनी ड्रैगन की गति और आकार ने भारतीय नीति-निर्माताओं के लिए झटके का काम किया है और इसकी वजह से भारत को अपनी रणनीति में बदलाव लाने के साथ भारतीय हाथी को कोंच कर नृत्य करने को विवश कर दिया। चीनी ड्रैगन के जाग जाने के बाद भारतीयों को पूर्व नियोजित संपर्कता परियोजनाओं को शीघ्र क्रियान्वित करने की जरूरत समझ में आई है। क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए भारत को देर-सबेर डिलीवरी का अपना मैकेनिज्म सुधारना ही पड़ेगा।’

विदेश नीति किसी देश की वह रणनीति है जिससे वह अंतरराष्ट्रीय परिवेश में अपने राष्ट्रीय हितों को हासिल करता है और उनकी सुरक्षा करता है। तेजी से वैश्विक बनते ‌इस जग में हर देश अपने राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा के लिए एक-दूसरे पर निर्भर है। संपर्कता को एक-दूसरे पर निर्भर इस जग में केंद्रीय स्थान हासिल है। संपर्कता देश की विदेश नीति को भी आकार दे रही है। भारत के विदेश सचिव एस. जयशंकर ने भी कहा है कि ‘प्रगति और संपर्कता’ भारत की विदेश नीति की सोच का अंग हैं।

ब्रिटिश राज की नीति भारत ने विरासत में पाई है। उसकी महत्वाकांक्षा ‘अगुवा शक्ति’ बनने और वैश्विक पटल पर निर्णायक भूमिका की है। इसे हासिल करने के लिए उसे बहुत स्थायित्व वाले पड़ोसी चाहि एं, जहां उसके प्रभुत्व को कोई चुनौती नहीं दे सके। इसे सुनिश्चित करने के लिए भारत ने भारतीय उपमहाद्वीपमें कई संपर्कता परियोजनाएं शुरू की हैं। चीन के विशाल ‘बेल्ट ऐंड रोड एनिशिएटिव’ (BRI)-जिसे पहले ‘वन बेल्ट, वन रोड’ कहा जाता था-दुनिया भर की राजधानियों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। BRI का उद्देश्य एशिया को यूरोप और अफीका से भूमार्गों और समुद्री मार्गों से जोड़ना है। यह आधुनिक काल में प्राचीन सिल्क रूट का ही पुनरुज्जीवन है। प्राचीन सिल्क रूट एशिया की प्रगति की गाथा में संपर्कता के महत्व का परिचायक है। संपर्कता आज भी एशिया की प्रगति और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। सचाई यह है कि संपर्कता की पुनर्बहाली और आधुनिकीकरण ‘एशियाई शताब्दी’ का लक्ष्य हासिल करने के लिए आवश्यक तत्व है। संपर्कता का पहलू केवल शारीरिक नहीं है, इसके सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक अभिप्राय भी हैं। 2016 के रायसीना संवाद की विषयवस्तु ‘एशियाई संपर्कता’ थी। अपने उद्घाटन भाषण में श्रीमती सुषमा स्वराज ने कहा था कि भारत जहां भी घरेलू, बाहरी या क्षेत्रीय कारणों से खुद जुड़ा हुआ है संपर्कता ही तय करेगी कि हम प्रगति, रोजगार और समृद्धि का अपना वादा कैसे पूरा करते हैं। शाब्दिक और लाक्षणिक-दोनों तरह से इससे ‘सबका साथ, सबका विकास’ की उपलब्धि हासिल होती है।

‘चाबहार’ : पाकिस्तान के लिए प्रलोभन?

अफगानिस्तान केवल एक पारगमन सड़क पर भरोसा करता था, जो कराची से हुकर गुजरती थी। पर अब यह बीते जमाने की बात हुई। (अब) उसके पास चाबहार से होकर गुजरने वाला रास्ता (भी) है। ‘काबुल के लिए पाकिस्तान पर अपनी निर्भरता समाप्त कर देना विदेश नीति की प्राथमिकता है और नई दिल्ली के लिए काबुल की साथ संपर्कता सुधारना इस युद्ध जर्जर देश में दीर्घकालीन रूप में अपना बहुद्देश्यीय संलिप्तता के लिए जरूरी है। पाकिस्तान के साथ ईरान के संबंध ऐतिहासिक रूप से संदेह के जाल में गुंथे हुए हैं, हालांकि तेहरान ने इस्लामाबाद को यह यकीन दिलाया है ‌कि वह भारत या किसी अन्य देश को चाबहार बंदरगाह का पाकिस्तान के खिलाफ उपयोग नहीं करने देगा, पर दरअसल, ईरान नहीं चाहता कि पाकिस्तान का खुला रुझान मध्य-पूर्व में सऊदी अरब के नेतृत्व वाले क्षेत्रीय ब्लॉक की ओर हो जाए। उसने यहां तक संभावना जताई है कि भविष्य में कभी पाकिस्तान भी इस परियोजना का अंग बन सकता है।

भारत को मालूम है कि वैश्विक होते जग में चीन का दक्षिण एशियाई क्षेत्र में प्रवेश रोक पाना कठिन है। नई दिल्ली चीन को रोकना नहीं चाहता, पर उसे यह भी लगता है कि चीन को भारतीय चिंताओं के प्रति ज्यादा संवेदनशील होना चाहि ए। भारत का सोच यह है कि BRI दक्षिण एशिया और हिंाद महासागर क्षेत्र में उनके राष्ट्रीय हितों के लिए विपरीत भू-राजनीतिक चुनौतियां पेश करता है। इसके विपरीत चीन एक बिलकुल अलग मिशन की राह पर चल रहा है। आर्थिक सुधारों की जो यात्रा देंग शियाओ पिंग के काल में शुरू हुई थी अब अच्छे नतीजे दे रही है। आज चीन की अर्थव्यवस्था विश्व की दूसरी सबसे विशाल अर्थव्यवस्था है। यूरोप की अर्थव्यवस्था 2008 की विश्व आर्थिक संकट से हुए नुकसानों से अभी तक उबर नहीं पाई है और अमेरिका का दुनिया के मामलों में अब पहले जैसा दबदबा नहीं रहा। ट्रंप प्रशासन की ‘पहले अमेरिकी’ नीति जहां आभास देती है कि अमेरिका विश्व के मामलों में नेतृत्व की अपनी भूमिका से कतरा रहा है, वहीं चीनी नेतृत्व इस ड्रैगन के लिए अवसर मानती है। इससे विश्व के घटनाक्रम की दिशा बदल सकती है। चीन विश्व में अपना प्रभाव बढ़ाने की ताक में है। BRI इस प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण पहलू है। चीन ने BRI के तहत परियोजनाओं के वित्तपोषण के लिए एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर ऐंड इन्वेस्टमेंट बैंक (AIIB) की स्थापना के विचार को आगे बढ़ाया है। AIIB की स्थापना विश्व बैंक की ब्रेटन वुड संस्थाओं और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के लिए चुनौती के रूप में देखी जाती हैं।

BRI शुरू करने के पीछे चीन का मुख्य उद्देश्य मलक्का की दुविधा का समाधान करना है। चीन का ज्यादातर तेल कारोबार मलक्का जलडमरूमध्य के रास्ते होता है, इसलिए वह चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरीडोर (CPEC) को BRI के एक महत्वपूर्ण संपर्क के रूप देखता है। यह कॉरीडोर चीन और तेल समृद्ध पश्चिम एशियाई क्षेत्र की दूरी कम कम देता है। यह पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरता है। अपनी संप्रभुता का उल्लंघन करने के कारण भारत इस कॉरीडोर के विचार का घोर विरोध करता है। दिल्ली का मानना है कि यह कॉरीडोर क्षेत्र की भू-राजनीति को प्रभावित कर सकता है। भारत ने चीन में मई, 2017 में हुए BRI शिखर सम्मेलन के बहिष्कार का रणनीतिक निर्णय किया। इस मंच की बैठक में अनुपस्थित रहने वाला भारत अकेला बड़ा देश था। BRI के इस कड़े विरोध को विश्व भर की राजधानियों में गौर से महसूस किया गया। भारत के विदेश मंत्रालय ने BRI को अंतरराष्ट्रीय रूप से मान्य सिद्धांतों, खुलेपन, पारदर्शिता और कानून के राज के खिलाफ बताया। भारत का मानना है कि BRI चीन की एकपक्षीय या राष्ट्रीय पहल है जो संपर्कता परियोजनाओं को आकार देने में दूसरे प्रतिभागी देशों की भूमिका को सीमित कर देती है। भारत का यह भी मानना है कि BRI के मौजूदा ढांचे से प्रतिभागी देशों के आर्थिक संकट में फंसने की आशंका बनती है। विवाद की हालत में नई दिल्ली के लिए इसके भू-रणनीतिक दृष्टि से भी निहितार्थ हो सकते हैं। चीन ने खुद भी BRI के कार्यान्वयन में बाधाओं का पूर्वानुमान किया है। मई, 2017 में संपन्न शिखर सम्मेलन में कुल 64 देशों ने भाग लिया था, पर बहुत कम देशों ने इस पहल का हिस्सा बनने का निर्णय किया। शिखर सम्मेलन में यूरोपीय संघ ने बीजिंग द्वारा तैयार व्यापार संबंधी बयान का समर्थन नहीं किया, इसके बजाय वह सामाजिक और पर्यावरण स्थिरता और पारदर्शिता को शामिल किए जाने पर जोर देता रहा।

आधे समय में सामान को उनके गंतव्य तक पहुंचाना

‘रूस और ईरान के बीच परिवहन कॉरीडोर, जो अजरबैजान से गुजरता है विशाल नॉर्थ-साउथ प्रॉजेक्ट का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पश्चिमी देशों ने जब ईरान के खिलाफ प्रतिबंध लगाए तब यह परियोजना रोक दी गई थी। ईरान पर प्रतिबंध हटाए जाने के बाद यह परियोजना फिर से प्रासंगिक हो गई है। रूस नॉर्थ-साउथ कॉरीडोर प्रॉजेक्ट के कार्यान्वयन पर ठोस अध्ययन शुरू करने को राजी हो गया है, जिसका एक हिस्सा रूस से अजरबैजान होते हुए ईरान जाते समय कैस्पियन सागर के पश्चिमी हिस्से से होकर गुजरेगा। इसके अंतर्गत परिवहन मंत्रालयों (विभिन्न प्रतिभागी) के संपर्क में काम करना होगा जो इस परियोजना के तकनीकी और आर्थिक मानकों पर चिंणतन करेंगे। इसके लिए सीमाशुल्क और सलाहकार सेवाओं के बीच परस्पर संपर्क की भी जरूरत पड़ेगी।’

भारत के लिए यह एक अहम समय है। 1991 में भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था के द्वार खोले और कई आर्थिक उपलब्धियां हासिल कीं। विश्व पटल पर भारत को ‘हाथी’ की उपमा दी जाती है। लोकतांत्रिक देश होने के नाते , भारत में रायशुमारी की बहुत महत्ता है और इसके कारण निर्णय की प्रक्रिया में असामान्य समय लग जाया करता है। चीनी ड्रैगन की गति और आकार ने भारतीय नीति-निर्माताओं के लिए झटके का काम किया है। इसकी वजह से भारत को अपनी रणनीति में बदलाव लाने के साथ भारतीय हाथी को कोंच कर नृत्य करने को विवश कर दिया। चीन ड्रैगन के जागने के बाद भारतीयों को पूर्व नियोजित संपर्कता परियोजनाओं को शीघ्र क्रियान्वित करने की जरूरत समझ में आई है। क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए भारत को देर-सबेरे डिलीवरी का अपना मैकेनिज्म सुधारना ही पड़ेगा।’

प्रधानमंत्री मोदी का अपने मंत्रिमंडल के शपथ ग्रहण समारोह में दक्षिण एशियाई देशों के नेताओं को आमंत्रित करना किसी कूटनीतिक छक्क से कम नहीं था। इससे ‘पड़ोसी पहले’ की नीति की नींव पड़ी। साढ़े तीन वर्ष बाद ‘पड़ोसी पहले’ की इस नीति के सामने कई बाधाएं दिखती हैं। सरकार की आकांक्षाओं और वास्तविकता के बीच भारी अंतर दिखने लगा है। शांतिपूर्ण पड़ोस की भारतीय इच्छाओं के रास्ते में पाकिस्तान एक रोड़ा बन गया है। 2015 में मोदी की लाहौर यात्रा के तुरंत बाद पाकिस्तान ने अपना असली रंग दिखाया और भारतीय भूमि पर आतंकवादी हमला कर दिया। इसका परिणाम पाकिस्तान में दक्षिण एशियाई नेताओं का शिखर सम्मेलन रद्द होने के रूप में हुआ। 2014 में साउथ एशियन एसोसिएशन फॉर रीजनल कोआपरेशन (SAARC) के काठमांडु शिखर सम्मेलन में भारत ने मोटर वाहन कानून और रेलवे सहयोग समझौते का प्रस्ताव रखा, ताकि दक्षिण एशियाई क्षेत्र में लोगों के स्तर पर सहयोग बढ़ाया जा सके। पर, पाकिस्तान ने दोनों ही परियोजनाओं को लाल झंडी दिखा दी। यहां तक कि ऊर्जा सहयोग फ्रेमवर्क समझौता भी पाकिस्तान के नकारात्मक रवैये के कारण अटका हुआ है। पाकिस्तान की अनदेखी करने के लिए मोदी उप-क्षेत्रीय संपर्कता का विचार सामने लाए हैं। जब पाकिस्तान ने मोटर वाहन संधि का हिस्सा बनने से मना कर दिया तो भारत ने पैंतरा बदलकर बांग्लादेश, भूटान और नेपाल को उप-क्षेत्रीय समूह का अंग बनने को राजी कर लिया ताकि विकास और संपर्कता के एजेंडा को आगे बढ़ाया जा सके। जून, 2015 में बांग्लादेश, भूटान, भारत और नेपाल (BBIN) ने यात्री और माल वाहनों के निर्बाध आवागमन के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते की राह में अब बाधा आ गई है, क्योंकि भूटान और बांग्लादेश ने क्रमशः पर्यावरण कारणों और आंतरिक मतैक्य के अभाव को कारण बताकर इस संबंध में आगे कदम बढ़ाने में असमर्थता जाहिर की है। भारत ने फिर भी उप-क्षेत्रीय संपर्कता के जरिए सकारात्मक परिणामों की आशा नहीं छोड़ी है। 5 मई, 2017 को भारत ने GSAT-9 या पहला दक्षिण एशिया उपग्रह के साथ जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च वी‌इकल (GSLV-F09) सफलतापूर्वक प्रक्षेपित ‌किया, जिसका निर्माण भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने किया है। उपग्रह के प्रक्षेपण से भारत की ‘पड़ोसी पहले’ की नीति को तो बल मिला ही है, अंतरिक्ष कूटनीति में भी उसने अपना एक विलक्षण स्थान कायम कर लिया है। इस परियोजना को त्यागने की उसकी अनिच्छुकता और एक अलग नाम से उप-क्षेत्रीय स्तर पर इच्छुक देशों के साथ आगे बढ़ने के उसके निर्णय से पड़ोसियों के साथ मोदी सरकार की रणनीति का आभास मिलता है। 2014 में मोदी ने भारत के वैज्ञानिक समुदाय से कहा था कि वह SAARC के उपग्रह के विकास की चुनौती को स्वीकारें, जिसे हम पड़ोसियों को भारत के उपहार के रूप में समर्पित कर सकें। दक्षिण एशियाई उपग्रह का सफल प्रक्षेपण इस चुनौती को पूरा करता है।

भारतीय और अफगान अर्थव्यवस्था फले-फूलेंगी

वाशिंगटन डीसी स्थित वुडरो विल्सन सेंटर के एशिया प्रोग्राम डिप्यूटी हेड माइकल कुगेलमन के अनुसार चाबहार का विस्तार भारत और अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था के लिए एक महान वरदान सिद्ध हो सकता है।

‘मेरा कहना है इसमें खेल बदल देने की संभावना है क्योंकि हम इस परियोजना के वास्तव में कार्यशील होने के बहुत दूर हैं। मैं यह नहीं समझता कि अभी परियोजना की जो प्रगति हुई है उसे लेकर हमें बढ़ा-चढ़ाकर कुछ अंदाज लगाना चाहि ए।’

‘समझौते हुए हैं और शुरुआत में गेहूं और इस तरह के दूसरे सामान जहाजों से भेजे गए हैं। पर, हम परियोजना के पूरी तरह कार्यशील होने की बातें करें, इससे पहले उस पर अभी भी बहुत सा काम किया जाना बाकी है’, उनका कहना है।

जिसे हम ‘हार्ड पॉवर’ और ‘साफ्ट पॉवर’ कहते हैं इसके लिए तकनीकी क्षमताओं का उपयोग पूरी तरह नई घटना नहीं है। कूटनीति में असैनिक टेक्नलॅजी की भूमिका पिछले दशक के आस-पास बलवती हुई। कई देशों ने अपनी असैनिक योग्यता का विदेश नीति के उपकरण के रूप में सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया है। दक्षिण एशिया उपग्रह के सफल प्रक्षेपण के साथ भारत ने क्षेत्रीय एकता के प्रोत्साहन और कूटनीति के प्रभावशाली उपकरण के रूप में अपनी तकनीकी क्षमताओं का लोहा मनवा दिया है।

दक्षिण एशिया का इतिहास हमें यह याद दिलाता है कि तूफान, भूकंप और दुष्काल जैसी प्राकृतिक आपदाओं ने इस क्षेत्र की जीविका को किस तरह नष्ट कर डाला है। वक्त की मांग यह है कि हम प्राकृतिक आपदाओं से बचाव के लिए वास्तविक वैज्ञानिक आंकड़ों को सृजित और एकत्र करें। दक्षिण एशिया उपग्रह इन आसन्न मुद्दों का समाधान करने और प्राकृतिक आपदाओं की जोखिमों और प्रभावों को कम करने में सहायक सिद्ध होगा। उपग्रह का दूसरा प्रयोग इस क्षेत्र में जल संकट के समाधान में किया जा सकता है। अंतरिक्ष टेक्नलॅजी का उपयोग हम हिमालय क्षेत्र में जल प्रबंधन के पहले कदम के रूप में कर सकते हैं, जो दक्षिण एशिया में पानी का एक बड़ा स्रोत है। इसके अलावा बांग्लादेश, मालदीव और भारत पर्यावरण परिवर्तन के रूप में एक दूभर चुनौती का सामना कर रहे हैं। दक्षिण एशिया उपग्रह इस खतरे का सटीक प्रकृति का अनुमान लगाकर समाधान सुझा सकता है। इसके अलावा दक्षिण एशिया उपग्रह सहयोगी देशों की आधारभूत ढांचे की कमियां दूर करने और बेहतर प्रशासन, दूरवर्ती क्षेत्रों में बैंकिंग और ‌शिक्षा और मौसम के बेहतर पूर्वानुमान को भी अधिक सुविधापूर्ण बना सकता है। दक्षिण एशिया उपग्रह जियोसिंक्रोनस संचार और मौसमविज्ञानी उपग्रह है, जो DTH (सीधे घर तक) प्रसारण के जरिए हर सहयोगी देश को एक महत्वपूर्ण क्षमता से लैस करेगा। हर दक्षिण एशियाई देश को एक ट्रांसपांडर मिलगा, जिससे वे समान ‘दक्षिण एशियाई कार्यक्रम’ के अलावा अपने खुद के कार्यक्रम प्रसारित कर पाएंगे। दक्षिण एशिया क्षेत्र इस समय कई समस्याओं से जूझ रहा है। यह हमें राष्ट्रीय से हटकर साथ काम करने की जरूरत महसूस कराता है। इसलिए इस उपग्रह के प्रक्षेपण के साथ मोदी का ‘सबका साथ, सबका विकास’ का मंत्र दरअसल, भारत के पड़ोस, खासकर दक्ष़िण एशिया के गरीब लोगों तक पहुंचाने की कोशिश है। दक्ष़िण एशिया उपग्रह सारी बीमारियों की रामबाण दवा नहीं है। यह दक्ष़िण एशियाई देशों के लिए एक अवसर है ताकि वे समान हेतु के लिए मिलकर काम कर सकें और अपनी कई तात्कालिक समस्याओं को दूर कर सकें।

उप-क्षेत्रीय संपर्कता को और मजबूत बनाने के लिए भारत ने आधुनिक अनुसंधान सुविधाओं वाले अपने वैज्ञानिक डेटाबेस और दूरवर्ती संपर्क-अत्याधुनिक नैशनल नॉलेज नेटवर्क का लाभ पा‌किस्तान को छोड़कर सभी SAARC देशों को देने का निर्णय किया है। इसके अलावा 2016 में गोवा में हुए BRICS शिखर सम्मेलन में भारत ने सदस्य देशों को BIMSTEC (Bay of Bengal Initiative for Multi-Sectoral Technical and Economic Cooperation) के लिए भी आमंत्रित किया है। यह भारत की उप-क्षेत्रीय चैतन्यता दर्शाने के अलावा पाकिस्तान को अलग-थलग करने के नई दिल्ली के जोश का द्योतक है। दिलचस्प बात यह है कि मालदीव, पाकिस्तान और अफगानिस्तान को छोड़कर सभी SAARC देश BIMSTEC का ‌हिस्सा हैं। BBIN समझौते के अनुरूप भारत ने BIMSTEC Motor Vehicle Agreement (MVA) को भी नेपाल में होने वाले शिखर सम्मेलन में अुनमोदित कराने का प्रस्ताव रखा है। ये दो समझौते BBIN और BIMSTEC MVA भारत की ‘पहले पड़ोसी’ और ‘ऐक्ट ईस्ट’ नीति के अभिसरण को दर्शाते हैं।

अफगानिस्तान जैसे निकट मित्रों से संपर्क की चाह में भारत ने काबुल से मुंबई से जोड़ने वाला अपना दूसरा एयर कॉरीडोर दिसंबर, 2017 के दूसरे सप्ताह में शुरू किया। इसके जरिए दो करोड़ अमेरिकी डॉलर मूल्य की दवाओं, मेवों और हस्तशिल्प का परिवहन हुआ। काबुल और दिल्ली के बीच पहला एयर कॉरीडोर जून, 2017 में शुरू हुआ था। भारत और अफगानिस्तान अपने द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत बनाने के लिए कृतसंकल्प हैं और एयर कॉरीडोर की शुरुआत के बावजूद दोनों देशों ने अन्य वैकल्पिक रेल और सड़क संपर्कता पर जोर देना जारी रखा हुआ है। पाकिस्तान को साथ लिये बगैर अफगानिस्तान और मध्य एशिया से संपर्कता कायम करने की महत्वाकांक्षा को रणनीतिक दृष्टि से ईरान के महत्वपूर्ण बंदरगाह चाबहार के दिसंबर, 2017 को पहले चरण के शुरू होने के साथ बड़ा बल मिला है। यह बंदरगाह पाकिस्तान में चीन द्वारा निर्मित ग्वादार बंदरगाह की काट का काम करेगा, जो चाबहार से महज सौ किलोमीटर दूर होने के साथ CPEC का एक महत्वपूर्ण संपर्क है। चाबहार बंदरगाह 2018 के आखिर तक कार्यशील हो जाने की आशा है। भारत ने अफगानिस्तान में जरांज-डेलाराम सड़क पहले ही बना रखी है जो ईरानी सीमा को सभी चारों प्रमुख शहरों से जोड़ती है। इन जारी परियोजनाओं के अलावा अंतर्सीमा वायु और भूमि संपर्कता, बिजली और ऊर्जा पहलें भी भारत सरकार के विचाराधीन हैं

रेलवे के जरिए सेंट पीटर्सबर्ग और फारस की खाड़ी की संपर्कता

नॉर्थ-साउथ कॉरीडोर के रेल मार्ग के कार्यान्वयन के फ्रेमवर्क के अंतर्गत कजाखिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और ईरान ने कैस्पियन सामर के पूर्वी छोर से लगी हुई रेल लाइन उजेन-गोरगन का निर्माण शुरू किया है जो ईरान जाने वाले मौजूदा लंबे मार्ग का स्थान लेगी।

‘इस मार्ग के निर्माण से इतिहास में पहली बार एक रेलवे पुल का निर्माण संभव हो जाएगा जो सेंट पीटर्सबर्ग से फारस की खाड़ी में बंदर अब्बास (ईरान) तक लगभग 4500 किलोमीटर लंबा होगा। यह उत्तरी-पश्चिमी और मध्य यूरोप का मध्य-पूर्व और दक्षिण एशिया से छोटे मार्ग से संपर्क छोटे मार्ग से जोड़ेगा।’ इस मार्ग अंतरराष्ट्रीय कंटेनर माल परिवहन के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। विशेषज्ञों के अनुसार इस बाजार का अनुमान 16-17 मिलियन टन का है।

कैस्पियन सागर के तट से गुजरते हए इस मार्ग के फायदे इंटरनैशनल यूनियन ऑल रेलवेज (UIC) ने 2008 में विकसित एक आर्थिक व्यवहार्यता रिपोर्ट में दर्शाए हैं, जिसके अनुसार यह मार्ग दीर्घकाल के हिसाब से सबसे व्यावहारिक है। जितने कम देश होंगे समझौते और सीमा पारगमन उतना ही आसान हो जाएगा। कैस्पियन सागर के पश्चिमी तट से लगने वाली दूरी छोटी है। प्रस्तावित मार्ग रेल परिवहन के विकास के प्रति विशेष महत्व का परिचायक है, मिसाल के तौर पर, काजविन-अस्तारा-राश्त मिसिंग हिस्से का निर्माण। अगर मुख्य हिस्सा काम करना बंद कर दे तो बैक-अप सेक्शन के रूप में वैक‌ल्पिक मार्ग (कैस्पियन सागर के जरिए या अजरबैजान होते हुए रेल परिवहन) भी हैं। इस मार्ग की सिफारिश संयुक्त राष्ट्र संघ और रशियन रेलवे, ईरानियन रेलवे और भारतीय रेलवे जैसे रेलवे संगठनों ने भी की है।’

इन प्रस्तावों में ढाका-चेन्नै-कोलंबो वायु संपर्कता, चटगांव-कोलकाता-कोलंबो नौवहन संपर्कता, बांग्लादेश-उत्तर बंगाल रेल लिंक, भारत के रास्ते बांग्लादेश-भूटान इंटरनेट केबल और भारत के रास्ते बांग्लादेश के नाकूगांव लैंड पोर्ट और भूटान के गैलीफूंग के बीच व्यापार मार्ग की संपर्कता शामिल है।

इस प्रस्तावों के अलावा भारत ने आने वाले वर्षों में कई ऊर्जा और बिजली पहलों को लेकर भी विचार बनाया है। वास्तव में BRI चीन के प्रतिस्पर्धियों के लिए एक तरह से वरदान बनकर उन्हें चीनी ड्रैगन के कॉमन खतरे के विरुद्ध एक साथ ले आई है। राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए भारत ने जापान, अमेरिका और आस्ट्रेलिया, सरीखे एक जैसी सोच वाले देशों के साथ हाथ मिला लिया है। जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने इन चारों देशों के संबंध मजबूत बनाने की बात करते हुए भारत-प्रशांत क्षेत्र में एक चतुष्कोणीय गठबंधन बनाने का विचार सामने रखा है।

पहले भारत ने चीन के BRI के मुकाबले के लिए स्पाइस रूट, कॉटन रूट और प्रॉजेक्ट मौसम की परिकल्पना की थी। दरअसल, प्रॉजेक्ट मौसम को मोदी सरकार का जबर्दस्त समर्थन मिला। संस्कृति मंत्रालय ने मानसूनी हवाओं के कारण हिंद महासागर के आस-पास के देशों को जोड़ने के लिए प्रॉजेक्ट मौसम परियोजना शुरू की थी। पर, ये सारी परियोजनाएं चल नहीं पाईं। भारत के पास संसाधनों की कमी थी। अपने सीमित संसाधनों को इन परियोजनाओं पर खर्च करने के बजाय नई दिल्ली को उनका इस्तेमाल पड़ोस में स्थायित्व बढ़ाने के लिए दक्षिण एशियाई क्षेत्र में महत्वपूर्ण मार्गों और बंदरगाहों पर करना चाहिसए। शुक्र की बात है कि भारत ने इस संबंध में सावधानी का रवैया अख्तियार किया है और अपने और निकटतम पड़ोसियों के यहां संपर्कता मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित किया है। अपनी 7517 किलोमीटर लंबी तटीय रेखा, संभावित आंतरिक जलमार्गो और अंतरराष्ट्रीय सामुद्रिक व्यापार मार्गों के इस्तेमाल के लिए भारत सरकार ने महत्वकांक्षी सागरमाला परियोजना की घोषणा की है, जिसका उद्देश्य है आंतरिक इलाकों की संपर्कता और बंदरगाह आधारित विकास को बढ़ावा देना। इस समय केंद्रीय और राज्य सरकारें बंदरगाह विकास का काम टुकड़ों में कर रही हैं। सागरमाला परियोजना का लक्ष्य भारत में बंदरगाहों के समग्र ‌विकास को प्रोत्साहन देने का है। प्रधानमंत्री मोदी ने 2016 में मुंबई में आयोजित एक मरीटाइम सम्मेलन में प्रस्तावित परियोजना की एक राष्ट्रीय दृष्टिकोण योजना जारी की थी। इस परियोजना पर मोदी की व्यक्तिगत छाप है। इसमें बंदरगाह केंद्रित विकास मॉडल भी शामिल है, जिसे वे गुजरात के अपने मुख्य मंत्रित्व काल में कामयाबी से कार्यान्वित कर चुके हैं। आयाम की दृष्टि से यह पहल बहुत ही विशाल है। इसके दायरे में करीब 400 विभिन्न परियोजनाएं आती हैं जिनका उद्देश्य आंतरिक संपर्कता को बढ़ाना, तटवर्ती आर्थिक क्षेत्रों का निर्माण, बंदरगाहों का आधुनिकीकरण और कौशल उन्मुख युवाशक्ति के पूल को और व्यापक बनाना है। आधारभूत कमियों से भारतीय बंदरगाह मालवहन में सुस्त पड़े हैं, जिसकी वजह से औद्योगिक गतिविधियों में लेटलतीफी हो रही है। इसके अलावा आंतरिक क्षेत्रों की सीमित संपर्कता, निर्माण या आर्थिक ग‌तिविधियां शुरू होने में तटवर्ती क्षेत्रों में विकास की कमी से होने वाली कठिनाइयां और इनलैंड नौवहन पर कम ध्यान दिए जाने से भारत की प्रगति की रफ्तार बढ़ने में बाधाएं उत्पन्न हो गई हैं। इस पहल की लागत 130 अरब डॉलर है। मछुआरा समाज पर नकारात्मक प्रभाव को लेकर भी चिंताएं व्यक्त की जाने लगी हैं। मंत्रालय की इस योजना इस पहल को चरणों में लागू करने की है। वह इसे 2035 तक पूरा करना चाहता है। इसलिए इस परियोजना के भावी पहलुओं पर अभी से टिप्पणी करना ठीक नहीं।

संपर्कता 21वीं सदी में भारत की कूटनीति का एक मुख्य विषयवस्तु है। यह उसकी ‘पड़ोसी पहले’ और ‘लुक ईस्ट’ नीतियों में ही नहीं, उसकी प्रवासी नीति में भी लक्षित होती है। जैसा कि श्रीमती सुषमा स्वराज ने कहा है भारत की प्रवासी नीति तीन C पर आधारित है-भारत के साथ कनेक्ट होना, भारतीय संस्कृति के साथ सेलिब्रेट करना और भारत की प्रगति में कंट्रीब्यूट करना। हमें यह समझना चाहिए कि संपर्कता का निर्माण और उसका सुदृढ़ीकरण भारतीय विदेश नीति की दीर्घकालीन तक चलने वाली गतिविधि है। इन परियोजनाओं को अमली जामा पहिनाने में भारत को एक और दशक लग सकता है।

जैसी कि पहले चर्चा हो चुकी है चीन 1978 में शुरू आर्थिक सुधारों से बोई फसल काट रहा है। इसके बावजूद कई देश भारतीय रुख का समर्थन कर रहे हैं। अमेरिकी विदेशमंत्री रेक्स टिलेर्सन ने चीनी योजना को ‘परभक्षी अर्थशास्त्र’ कहते हुए फटकार लगाई है। टिलेर्सन ने भारतीय चिंताओं को दोहराते हुए चीन पर विश्व व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने, दूसरे देशों की संप्रभुता को नष्ट करने और विवेकहीन तरीके से काम करने के इलजाम भी लगाए हैं। संक्षेप में, ये देश अब चीन के प्रच्छन्न इलाकों को भांपने और उसकी इन पहलों के खिलाफ आवाज उठाने लगे हैं। पाकिस्तान में कई व्याख्याकारों ने भी पाकिस्तान की आर्थिक संप्रभुता और संस्कृति को पहुंचने वाले नुकसानों को लेकर चेतावनी दी है। नवंबर, 2017 में पाकिस्तान, नेपाल और म्यांमार ने डायमर-भाषा बांध परियोजना, बुधी गंडकी पनबिजली परियोजना और मितसोने बांध परियोजना रद्द कर डालीं, जिनकी कुल लागत 20 अरब डॉलर आंकी गई है। इन परियोजनाओं की योजनाएं चीनी कंपनियों ने बनाई थीं। उनको रद्द किए जाने से चीन की महत्वाकांक्षी BRI योजना को गंभीर झटका लगा है। इसके अलावा चीनी नीर्ति निर्माताओं के सामने उग्रवाद एक बड़ी चुनौती के रूप में उभरा है। इन परियोजनाओं की अप्रत्याशित कमियों के कारण चीन के सामने उनपर ‌‌फिर से मोल-तोल करने, रद्द करने और टाल देने की नौबत आ गई है। चीनी परियोजनाएं इसके अलावा जितनी दिखती हैं उससे कहीं महंगी हैं। चीन शुरू में किसी देश को बहुत लुभावना प्रस्ताव देता है, पर बाद में मोल-तोल कर उसपर भारी ब्याज दर थोप देता है। जब वह देश ऋण के भुगतान में विफल हो जाता है तो चीन उससे अपना कोई बंदरगाह या क्षेत्र का कोई हिस्सा 99 वर्ष की लीज पर सौंपने को कहता है। श्रीलंका में हाल में ऐसी ही स्थिति पैदा हुई। कई देशों ने चीन की यह रणनीति समझ ली है और उसके नव-उपनिवेशवाद मंसूबों से खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे हैं।

भारत का विकास का मॉडल चीनी मॉडल से बिलकुल उलटा है। जहां चीन ‘चेक बुक कूटनीति’ में भरोसा रखकर गरीब देशों को ऋण देता है वहीं भारत का सहायता कार्यक्रम उस देश के प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण पर फोकस रखता है। चीन की तुलना में भारत विभिन्न परियोजनाओं को लागू करने के मामले में बहुत आलसी है। पर, चीन की विशाल चुनौतियों को देखते हुए भारत को अपनी निषेधात्मक दृष्टिकोण का परित्याग कर और सक्रिय भूमिका अख्तियार करनी होगी। भारत को इस कमी को पूरा करने के लिए समानांतर काम करने की जरूरत है। एक ओर, अधिक अधुनातन टेक्नलॅजी की मदद से उसे घरेलू संपर्कता को मजबूत करने की कोशिशें जारी रखनी होंगी, दूसरी ओर ‌वियतनाम, जापान, अमेरिका और आस्ट्रेलिया जैसे समविचारी देशों से संबंध मजबूत करने होंगे। भारत और उसके मित्रों की परभक्षी अर्थशास्त्र की चीनी नीति के विरुद्ध आवाज उठानी चाहिए और उसके मंसूबों को विफल कर देना चाहिपए। भारत के लिए यह बहुत अनुकूल समय है। वह अपनी परियोजनाएं पूर्ण करने के लिए दशकों का इंतजार नहीं कर सकता। तकनीक नवाचार भारतीय हाथी को नचाने में मददगार हो सकती है। यूरोप में तकनीकी रूप से अति शक्तिशाली देशों से बढ़ती मैत्री उसकी रुकी हुई योजनाओं को फिर से पर लाने के लिए एक अच्छा लक्षण है। मौजूदा विश्व व्यवस्था की सीमितताओं और उभर रही विश्व व्यवस्था के अनिश्चित रूप को देखते हुए भारत को अपने कदम बहुत संभलकर उठाने होंगे। संपर्कता विश्व व्यवस्था के निर्माण में एक विध्वंसकारी विचार के रूप में उभरकर सामने आई है। इस विध्वंसकारी विश्व में भारत और चीन-दोनों की रणनी‌‌ति को देखना बहुत दिलचस्प होगा।

– अनिकेत भावथनकर
(अनिकेत भावथनकर पुणे के‌ सिंबियासिस स्कूल ऑफ इंटरनैशनल स्टडीज में असिस्टेंट प्रफेसर हैं। उनसे (email- aubhavthankar@gmail.com, Twitter : @aniketbhav) पर संपर्क किया जा सकता है।)

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