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संपर्कता को चाहिए उपनिवेशी मानसिकता से छुटकारा

भारत हमेशा से वाणिज्य और संस्कृति की भूमि रहा है। उसके आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहलू हमें मालूम ही नहीं, उनपर इठलाते हुए हम चर्चाएं भी किया करते हैं। पर, व्पापार और वाणिज्य हमारी राष्ट्रीय चेतना से ओझल हो गए हैं। हमारे संवाद में संपर्कता अगर आती है तो स्वभावतः व्पापार और वाणिज्य के बहाने ही। दुर्भाग्य से औपनिवेशिक काल से ही संपर्कता को विदेशी चश्मे से देखा जाता रहा है। यही वजह है कि पूर्वोत्तर को ‘ऐक्ट ईस्ट’ नीति के अधीन जोड़ने का मुद्दा हो या ईरान के चाबहार बंदरगाह को विकसित करने का-चिंतनधारा मुख्यतः केंद्रित हो जाती है या तो उनके रणनीतिक पहलू पर, या फिर चीन को घेरने की रणनीति पर। संपर्कता को सशक्त बनाने के मुद्दे का-चाहे वह सामुद्रिक हो या सड़क संबंधी का-आज की भू-राजनीति में रणनीतिक महत्व है। पर जब तक हम इसे अपनी सभ्यता के संदर्भ में नहीं देखेंगे, सांस्कृतिक और वाणिज्यिक संबंधों की पूरी संभावनाओं का दोहन नहीं कर पाएंगे।

इतिहास की बदलती धारा

1447 में पुर्तगाली अन्वेषणकर्ता वास्को-डि-गामा ने जब यूरोप से भारत का समुद्री मार्ग खोजा तो मार्गदर्शन के लिए उसके पास एक गुजराती था। वास्को-डि-गामा ने अपने यात्रा वृत्तांत में लिखा है कि किस तरह कानजी मालम नामक एक कच्छी नाविक समुद्री रास्तों से उसे पूर्व अफ्रीका के मालिंदी तट से कालिकट तक ले आया था। उसने इस बात का खास उल्लेख किया है कि कानजी मालम का जहाज उसके जहाज से तीन गुना बड़ा था। कैसी विडंबना है कि हमारी अपनी इतिहास और पाठ्य पुस्तकों में वास्को-डि-गामा का तो जिक्र है, पर कानजी मालम का नहीं।

हाल में इतिहासकार और विद्वान गुजरात के बंदरगाह नगर मांडवी में ‘गुजरात और समुद्र’ विषयक तीन दिन के एक मरीटाइम सम्मेलन के सिलसिले में मिले तो उन्होंने इस अभियान के बारे में भी चर्चा की। यह बात भूलाई नहीं जानी चाहिए कि मालम मांडवी से ताल्लुक रखते थे, जो गुजरात में जहाज निर्माण की धुरी था। इसलिए यह धारणा, कि भारत में नौसैनिक और समुद्री पथ प्रदर्शन तकनीकी लाने वाले अंग्रेज थे-पूरी तरह सही नहीं है। यहां यह बताना जरूरी है कि सिंधु-सरस्वती सभ्यता की अर्थव्यवस्था काफी हद तक व्यापार पर ही टिकी हुई थी। सिंधु की मोहरों के विश्व के वि‌भिन्न हिस्सों में पाया जाना इस बात का प्रमाण है कि किस तरह यह सभ्यता विशालतम माने जाने वाले व्यापारिक क्षेत्रों में-मेसोपोटामिया से लेकर चीन तक फैली हुई थी।

फ्रांस, पुर्तगाल, चीन, सिंगापुर और श्रीलंका के जिन विद्वानों और शोध संस्थानों ने मांडवी में हुए गुजरात की मरीटाइम और व्यापारिक इतिहास विषयक इस सम्मेलन में भाग लिया-उन्होंने यह स्वीकार किया है कि मालिंदी में-वास्को-डि-गामा के नाविकों ने एक जहाजी को इस बात के लिए राजी कर लिया था वह इस दल को कालिकट का रास्ता दिखाएगा। इस बात पर तो सर्वानुमति नहीं बन पाई कि यह जहाजी कौन था, पर मोटे तौर पर भारत के मरीटाइम ‌इतिहास के विभिन्न पहलुओं को लेकर आम राय थी। संपर्कता पर चर्चा करते समय यह बात हमारे ध्यान से ओझल नहीं होनी चाहिए।

रणनीतिक संस्कृति या सांस्कृतिक रणनीति?

भारत और चीन-दोनों ही प्राचीन सभ्यताएं हैं। दोनों में आर्थिक विकास और गुणवत्तापूर्ण मानवीय संसाधनों की दृष्टि से अकूत संभावनाएं हैं। इसलिए दोनों देशों में में प्रतिस्पर्धा, सहयोग और द्वंद्व होना भी उतना ही स्वाभाविक है। इसलिए चाहे ‘ऐक्ट ईस्ट’ नीति हो, भारत के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र की मार्फत ईरान और पश्चिम एशिया से जलमार्गो, सड़क और रेल के जरिए संपर्कता की बात हो, या सागरमाला जैसी परियोजनाओं के जरिए मरीटाइम चैतन्यता हासिल करने का मुद्दा-इन सभी को चीन की ‘स्ट्रिंग्स ऑल पर्ल’ रणनीति के मुकाबले की तैयारी के रूप में ही देखा और समझा जाता है। यह सही है कि हमें अपने उद्देश्यों और रणनीतियों को स्पष्टतया समझकर उनके अनुरूप ही अपनी राष्ट्रीय रणनीतिक संस्कृतिप विकसित करनी चाहिेए, पर एक सभ्य राष्ट्र के रूप में कहीं ज्यादा जिम्मेदारी हमारी इस बात के लिए बनती है कि हम संपर्कता को अपनी सांस्कृतिक रणनीति का अंग भी बनाएं।

भारत और चीन सदियों से एक-दूसरे के पड़ोसी हैं। दोनों के ही अपने प्रभाव क्षेत्र हैं। ज्यादातर चीनी यात्रियों ने भारत की महान शिक्षा संस्थाओं में शिक्षा हासिल की है और भारत का बखान ज्ञान की भूमि के रूप में किया है।

इसलिए चौल काल से ही, बौद्ध धर्म का स्वीकार रहा हो, या सामुद्रिक व्पापार की मार्ग संपर्कता-उनकी कल्पना खतरे के रूप में कभी की ही नहीं की गई। पूर्वी तट पर बाली यात्रा हमारी परंपरा का अंग भले ही बन गई हो, पर इसका उद्देश्य दूसरे देशों का उपनिवेशीकरण नहीं रहा। राधाकुमुद मुखर्जीँ की पुस्तक 1912. Indian Shipping – A history of the sea-borne trade and maritime activity of the Indians from the earliest times) जो लांगमैंस, ग्रीन ऐंड कंपनी, मुंबई ने प्रकाशित की है-भारत की गहराई और उसकी सामुद्रिक पहुंच को बहुत अच्छे ढंग से व्याख्यायित करती है। उत्तरकुरू ही वह रास्ता था, जो हमें आज के मध्य एशिया से जोड़ा करता था। सांस्कृतिक जुड़ाव और जीवंत व्यापार संभावनाओं के ये रास्ते इस्लामी आक्रमण के साथ ही नष्ट हो गए। नालंदा और तक्षशिला को जला दिया जाना पूर्व और उत्तर-पश्चिम से हमारी संपर्कता के लिए बहुत बड़ा झटका था। ज्ञान और व्पापार की धरती के रूप में भारत के ब्रांड को भी इसने काफी नुकसान पहुंचाया। सबसे बड़ी बात, मुगल शासन में हम अपनी सामु‌द्रिक चेतना से ही हाथ धो बैठे, क्योंकि समुद्र की ‌फिक्र छोड़ मुगलों का पूरा ध्यान भूमार्ग से अपने साम्राज्य विस्तार की कोशिशों में ही लगा रहा। व्पापार और सांस्कृतिक स्तरों पर चीनी सभ्यता से हमारे विच्छेद की शुरुआत भी इसी काल की देन है। ब्रिटिश काल में इसमें जान तो आई, पर इसका उद्देश्य सिर्फ, और सिर्फ अंग्रेजों का हितसाधन था। मरीटाइम शक्ति बनने के ख्वाहिशमंद अंग्रेजों को जंबूद्वीप में अपनी यह महत्वाकांक्षा पूर्ण करने की भारी संभावना दिखाई दी जिसका उन्होंने सामुद्रिक मार्गों पर नियंत्रण में खूबी से उपयोग भी किया। पर, उनके इस प्रयास में समुद्र तट पर मौजूद हमारी परंपरागत जहाज निर्माण उद्योग तबाह हो गया। इससे भी खराब बात यह हुई कि शिक्षा प्रणाली में सुनियोजित ढंग से घुसपैठ करके उन्होंने हमारी मन-मस्तिष्क को दास बना लिया। नतीजा यह हुआ कि समुद्र से बेखबर होकर हम अपनी ही विरासत के प्रति शंकालु बन गए।

अंग्रेजी शिक्षा के मुद्दे पर इन सब बातों को समेटते हुए स्वामी विवेकानंद लिखते हैं, ‘बच्चे को जब स्कूल ले जाया जाता है तो पहली बात जो वहां सीखता है वह यह है कि उसका पिता मूर्ख है। दूसरी बात वह यह सीखता है किर उसका दादा पागल था। तीसरी बात यह कि उसके सारे शिक्षक कपटी हैं और चौथी यह कि उसके सारे धर्म ग्रंथ झूठ की पोटली हैं। 16 की उम्र का होने तक वह नकारात्मक, निष्प्राण और अस्थिविहीन हो जाता है।’

हमारे इतिहासबोध, भूगोल, विश्व संपर्कता और एक देश के रूप में हमारी पहचान के साथ यही होता आया है। भारत-चीन संबंधों को भी इसी उपनिवेशी चश्मे के नजरिए ही आकार दिया गया।

स्वतंत्रता के बाद शीत-युद्ध और वैचारिक प्रतिद्वंद्विता ने हमारी चिंरतनधारा और रणनीतियों को आकार दिया। स्वतंत्र विदेश नीति के प्रति आग्रह होने के बावजूद अपने राष्ट्रीय सांस्कृतिक पटल पर इसे हम हासिल नहीं कर पाए। नई सीमाओं और राष्ट्र-राज्य की पश्चिमी सोच ने खुद की पुनर्खोज भारतवर्ष के रूप में करने में हमारे हाथ बांध दिए। वैश्वीकरण की प्रक्रिया ने हालांकि हमें विश्व के साथ पुनः जुड़ने का अपूर्व अवसर प्रदान किया, पर अब यह अमेरिकी नजर से निर्देशित है और मुख्यतः अर्थव्यवस्था केंद्रित बन कर रहा गया है।

औपनिवेशिक मानसिकता से छुटकारा

नरसिम्हाराव सरकार ने विश्व के पूर्वी हिस्से से अपनी शर्तों पर भारत के संबंध बनाने शुरू किए, जिसे वाजपेयी सरकार ने प्रभावशाली ढंग से आगे बढ़ाया। नरेंद्र मोदी सरकार इस प्रक्रिया को सिर्फ आगे नहीं ले जा रही है, वरन सड़क, रेल, मरीटाइम और सांस्कृतिकता के साथ जोड़कर इसे और मजबूत बना रही है। इसकी सबसे अहम बात है अपने पड़ोसी को सभ्यता के चश्मे से देखना। इस संपर्कता का अगला स्तर है योग को भारत की प्राचीन प्रज्ञा के रूप में विश्व मंच पर स्थापित करना। विश्व के हर राष्ट्र-राज्य को सम्मान और बराबर का दर्जा देना ‘वसुधव कुटुंबकम’ के हमारे संगठन मूल्यों के अनुरूप है। सौर मैत्री पहल के जर‌िए नेतृत्व प्रदान करना भी संपर्कता की ही अंग है।

दूसरे शब्दों में, हम संपर्कता काअपनी खुद की शर्तों पर पुर्नसंधान कर रहे हैं, जो आधारित हैं हमारे खुद के मूल्यों पर। पुर्नर्वलोकन में लगे चीन और चीन-पाकिस्तान गठबंधन की रणनीतिक चुनौती वास्तविक है। इनका मुकाबला हमें रणनीतिक रूप से ही करना होगा। ऐसा करते समय हमें यह नहीं भूलना चाहििए कि संपर्कता का हमारा उद्देश्य दूसरों को उपनिवेश बनाना नहीं, बल्कि अपने सहृदय व्यवहार से उनका मन जीतना है। हमारे राष्ट्रीय हित और रणनीतिक दूरदृष्टि अपनी सभ्यतात्मक बौद्धिकता के साथ इन दिनों नया आकार लेने में लगी है। इसका लाभ हमें सिर्फ अधिक व्यापार, पर्यटन और रणनीतिक प्रभाव के रूप में नहीं होगा, वरन इससे विश्वगुरू बनने की हमारी राह भी आसान हो जाएगा। इसके लिए हमें संपर्कता संबंधी संवाद को औपनिवेशिक सोच से मुक्ति देनी होगी और यह देखना होगा कि संपर्कता की ये पहलकदमियां राष्ट्रीय दृष्टिकोण से हों। हमें अपने मन-मस्तिष्क को ही सबसे पहले दासता के इस बंधन से मुक्त बनाना होगा।

– प्रफुल्ल केतकर

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