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OBOR में गैर भागीदारीः तर्क और विकल्प

‘चीन ने 13वीं पंचवर्षीय योजना को ‘नव सामान्य’ (New Normal) घोषित किया है। इससे भारी उद्योग से हटकर इलेक्ट्रॉनिक्स और दूरसंचार की उच्च गुणवत्ता वाली ऊंची वैल्यू चेन पर जोर दिया जाने लगा है।

इसमें संसाधनों को निकालने की जरूरत कम होती है। निवेशों पर चीनी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 19 प्रतिशत तक मुनाफा दे रहे हैं। यह उनके फोकस का विषय हो सकता है, पर चीनी बड़ी आधारभूत परियोजनाओं में अभी भी निवेश कर रहे हैं, जिनकी पे-बैक अवधि अमूमन 14 वर्ष होती है। बीते वर्ष ये परियोजनाएं 18.4 प्रतिशत की दर से बढ़ीं। दिलचस्प बात यह है कि चीन ने 25 करोड़ डॉलर के मूल्यांकन वाली होल्सि‌म श्रीलंका सिमेंट कंपनी का 50 करोड़ डॉलर देकरअधिग्रहण किया। मुख्यतः इसलिए कि त्रिंकोमाली बंदरगाह उसके कब्जे में आ जाए।

यह उदाहरण सिर्फ यह समझाने के लिए है कि चीन के लिए आर्थिक, रक्षा, विदेशी मामले-किसी का कोई मतलब नहीं है। उसके लिए जो कुछ है केवल रणनीतिक है।

ईश्वर ने युद्ध बनाया ही इसलिए है कि चीनी भूगोल पढ़ें।

कोई जगह ऐसी नहीं बची है जहां चीन कूटनीति समस्या से नहीं जूझ रहा हो। इसमें शक नहीं कि चीन के लिए अर्थव्यवस्था, सैन्य शक्ति और राजनीतिक स्थातित्व की तीन-तरफा प्रगति 1980 और 1990 के दशकों के आखिरी वर्षों (1989 के मध्यांतर के बाद) के पूरी तरह अनुरूप रही। यह इसलिए हो पाया कि चीन इस समय तक इतना मजबूत नहीं था। जैसे-जैसे चीन मजबूत होता गया वह नाइन-डैश लाइन या सीमा विवादों के जर‌िए बहुत से देशों को दरकीनार करने लगा। आज लाओस, कंबोडिया और पाकिस्तान व उत्तर कोरिया जैसे दुष्ट राज्यों को छोड़कर उनका कोई दोस्त नहीं है।

36 वर्ष पहले आर्थिक सुधार और व्यापार उदारीकरण का सिलसिला शुरू होने से पहले चीन की राजनीतित कुछ ऐसी थी जिससे उसकी अर्थव्यवस्था बहुत दुर्बल व अक्षम, ठहरी हुई, केंद्रीयकृत और वैश्विक अर्थव्यवस्था से अपेक्षाकृत कटी हुई थी। 1979 में विदेशी व्यापार और निवेश को खोलने और मुक्त व्यापार के सुधारों के बाद चीन आज विश्व के सबसे तेजी से प्रगति करने वाली अर्थव्यवस्थाओं में शुमार है, जिसका वार्षिक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) 2014 तक औसतन 10 प्रतिशत की दर के आस-पास रहा है। हाल के वर्षों में चीन बड़ी वैश्विक आर्थिक श‌क्ति के रूप में उभरकर सामने आया है। आज यह विश्व की विशालतम अर्थव्यवस्था (क्रय क्षमता की समानता के लिहाज से), उत्पादक, व्यापारी और विदेशी मुद्रा भंडार का धारक देश है।

2008 में वैश्विक आर्थिक संकट ने चीन की अर्थव्यवस्था को बहुत प्रभावित किया है। चीन का ‌निर्यात, आयात और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश गिर गया, GDP की प्रगति कम हो गई और करोड़ों मजदूरों को नौकरी से हाथ धो लेना पड़ा। इस स्थिति से निबटने के लिए चीन सरकार ने प्रोत्साहन के रूप में 585 अरब डॉलर का पैकेज कार्यान्वित किया और बैंक उधारी बढ़ाने के ‌लिए मौद्रिक नीतियों को ढीला कर दिया। इन नीतियों से चीन को चीनी उत्पादों की मांग में वैश्विक स्तर पर आई कमी से प्रभावशाली ढंग से निबटने में मदद मिलती है। चीनी अर्थव्यवस्था में हाल की गिरावट के लिए निर्यात और स्थायी ‌निवेशों की प्रगति दर में आई कमी भी जिम्मेदार रही है। उसकी वास्तविक GDP 2010 में 7.8 प्रतिशत से गिरकर 2014 में 7.3 प्रतिशत रह गई। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने चीन की विकास दर का वास्तविक अनुमान 2015 के लिए 6.8 प्रतिशत और 2016 के लिए 6.3 प्रतिशत किया है। चीन की आर्थिक प्रगति की दर पहले ज्यादा इसलिए रही कि उसकी घरेलू बचत की दर ज्यादा थी। इसी तरह उत्पादकता और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भी अधिक था, पर अब स्थिति बदल गई हैः-

  • चीन का आंतरिक ऋण GDP का 377% है, बकाया बांडों की कुल कीमत 37 खरब RMB है जो इस वर्ष के अंत तक प‌रिपक्व हो रहे हैं। बकाया बांडों की वृद्धि दर 23 प्रतिशत है, जबकि GDP की वृद्धि दर अटक कर 10 प्रतिशत से नीचे आ गई है।
  • चीन के के कई साफ्ट पॉवर प्रॉजेक्ट-जिनमें कोलंबिया और निकारागुआ के ड्राई कैनल प्रॉजेक्ट शामिल हैं-विफल हो गए हैं। मैक्सिको ने 43 अरब डॉलर की परियोजनाएं रद्द कर दी हैं और होंडुरास की परियोजनाएं तो पर्यावरण संबंधी कारणों से शुरू ही नहीं हो पाई हैं।
  • RMB के अवमूल्यन से भी ‌चिंताएं पैदा हुई हैं, क्योंकि इससे करेंसी वॉर और संदेहजनक हेज फंड की समस्या शुरू हो सकती है। RMB को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में ‘गोल्डन बास्केट’ का दर्जा हासिल है।
  • आधारभूत क्षेत्र, सिमेंट और इस्पात उद्योग में काफी बड़ी क्षमता बगैर किसी इस्तेमाल के पड़ी है। इससे 16-25 मि‌लियन कामगारों की छंटनी करनी पड़ी है। बैंकों में 40 अरब डॉलर के बराबर गैर निस्पंदकारी संपतियां (NPA) जमा हो गई हैं। इसका 20 प्रतिशत हिस्सा आधारभूत कंपनियों में हैं, जिसकी वजह से क्रेडिट रेटिंग का पुनर्मूल्यांकन करना पड़ा है।

OBOR का विष्लेषण

OBOR (बेल्ट ऐंड रोड एनिशिएटिव) का विष्लेषण इस पृष्ठभूमि पर किया जाना चाहिए। चीन ने 13वीं पंचवर्षीय योजना को ‘नव सामान्य’ (New Normal) घोषित किया है। इससे भारी उद्योग से हटकर इलेक्ट्रॉनिक्स और दूरसंचार उच्च गुणवत्ता वाली ऊंची वैल्यू चेन पर जोर दिया जाने लगा है। इसमें संसाधनों को निकालने की जरूरत कम होती है। निवेशों पर चीनी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश काफी अच्छा-19 प्रतिशत तक मुनाफा दे रहे हैं। इसपर ध्यान केंद्रित करते हुए चीन अभी भी बड़ी आधारभूत परियोजनाओं में-जिनकी पे-बैक अवधि अमूमन 14 वर्ष होती-निवेश बनाए हुए है। पिछले वर्ष इन परियोजनाओं की वृद्धि दर 18.4 प्रतिशत रही। यहां गौर करने वाली बात यह है कि चीन ने 25 करोड़ डॉलर के मूल्यांकन वाली होल्सि‌म श्रीलंका सिमेंट कंपनी का अधिग्रहण दूनी कीमत, यानी 50 करोड़ डॉलर में करने में संकोच नहीं किया। किसलिए? इसलिए कि त्रिंकोमाली बंदरगाह उसके कब्जे में आ जाए। इस उदाहरण का निहितार्थ बस इतना है कि चीन के लिए आर्थिक, रक्षा, विदेशी मामले-इन सारी बातों का कोई मतलब नहीं है। उसके लिए जो कुछ भी होता है रणनीतिक होता है।

बेल्ट ऐंड रोड एनिशिएटिव शी ‌जिनपिंग का ड्रीम प्रोजेक्ट है जिसके बारे में कइयों को संदेह है कि यह उनकी रणनीतिक योजना है ताकि वे शी की स्थिति मजबूत करने के साथ चीन के आंतरिक मुद्दों से लोगों का ध्यान हटा सकें। भारत को BRI (OBOR) से बहुत सावधानी से काम लेने की जरूरत है। यह भूलना नहीं चाहिए कि चीनियों ने जब भी आसान ऋण दिए हैं उनकी लागत बेतहाशा रही है। चीन ने श्रीलंका को 1971-2012 के दौरान आधारभूत विकास के लिए पांच अरब डॉलर, हंबनटोटा, मट्टाला हवाई अड्डे और कोलंबो सिटी पोर्ट के लिए दो अरब डॉलर के ऋण 6.3 प्रतिशत ब्याज पर दिए और चूंकि श्रीलंका उसे चुकाने में असमर्थ है उन्होंने उसे इक्विटी में परिवर्तित कर दिया। नतीजा यह है कि चीन के पास आज कुल शेयरों का 80 प्रतिशत हिस्से के साथ हंबनटोटा की 99 वर्ष की लीज है। यही हश्र चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरोडोर (CPEC) का हुआ। इसके अलावा CPEC गिलगिट-बाल्टीस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से गुजरता है ‌और इसलिए भारत के लिए उसमें शामिल होने का सवाल ही नहीं।

विशाल निवेश

BRI के दायरे में 65 देश, 62 प्रतिशत विश्व आबादी और 30 प्रतिशत आर्थिक उत्पादन आता है। यह सात खरब डॉलर की परियोजना है। 2016 में सात आधारभूत परियोजनाओं-जिनमें उपयोगिताओं और दूरसंचार शामिल हैं-500 अरब डॉलर की परियोजनाएं और M & A (विलय और अधिग्रहण) के सौदे घोषित किए गए थे, जो 2015 की तुलना में गिरावट है। इनमें एक-तिहाई सौदे चीन में हुए, जिसने इनमें 115 अरब डॉलर के अतिरिक्त वित्तपोषण की बात स्वीकार की है। इसलिए कई चिंतक तो इन परियोजनाओं की व्यवहार्यता को लेकर ही संदेह रखते हैं। चीन CPEC को लेकर इन कारणों से खुद भी भयभीत हैः

  • पाकिस्तान में राजनीतिक दलों में सत्ता को लेकर प्रतिस्पर्धा।
  • शिया और सुन्नियों के बीच धार्मिक प्रतिद्वंद्विता और इसके परिणामस्वरूप होने वाली अशांति।
  • CPEC (चीन-पाकिस्तान इकोनॉ‌मिक कॉरोडोर) से लगे इलाकों में आदिवासियों के कष्ट।
  • बलूचिस्तान में आतंकवादी ग‌तिविधियां।
  • पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका की दखलंदाजी।

यहां लेखक ने भारत की स्थिति के आकलन के लिए दो परिणामात्मक तकनीकों का प्रयोग किया हैः

  1. Braess’s Paradox : नेटवर्क थ्योरी पर आधारित BRI में भाग न लेने संबंधी भारतीय दृष्टिकोण का स्पष्टीकरण। यह विरोधाभास सिद्ध करता है कि भारत को क्यों BRI का अंग नहीं बनना चाहि ए!
  2. Selfish Routing: गेम थ्योरी का यह दृष्टिकोण बताता है कि किस तरह कम निवेश के बावजूद निजी सूचनाओं के कारण चीन खुद को फायदा पहुंचाता है और इस तरह भारत के BRI का ‌हिस्सा न बनने का समर्थन करता है।

भारत के लिए विकल्प

इसलिए लेखक की मान्यता है कि भारत के लिए BRI में भाग न लेना ही उचित है।

  1. जितनी जल्दी संभव हो भारत-बांग्लादेश-म्यांमार-थाइलैंड पहल को पूरा करना।
  2. ‘ऐक्ट ईस्ट’ से पहले पूर्वोत्तर की समस्याओं का यथासंभव निबटारा।
  3.  चाबहार बंदरगाह का ‌विस्तार और हार्ट, कंधार, काबुल और मजार-ए-शरीफ को जोड़ने वाली गालैंड रोड के जर‌िए मीलक, जरांज और देलाराम की संपर्कता। जापान और भारत के एग्जिम बैंक के समर्थन से विकास के कार्य।
  4. ईरान, अफगानिस्तान और रूस को जोड़ने वाले नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरीडोर के हिस्से के रूप में चाबहार-जहेदान रेलवे लाइन के लिए जिस सहमति पत्र पर हस्ताक्षर हुए हैं उसे लागू करना। ईरान ने भारत के एग्जिम बैंक की कर्ज की अर्जी अभी तक पूरी नहीं की है, इसलिए यह योजना विलंबित है।
  5. नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरीडोर-भारत, रूस, अफगानिस्तान, मध्य एशिया और यूरोप को जोड़ने वाला जहाजी, सड़क और रेल मार्ग।
  6. मध्य-एशिया संपर्कता को खोला जाना।
  7. ऊर्जा संबंधी सुरक्षा के लिए भारत को तुर्कमेनिस्तान‌-अफगानिस्तान-पाकिस्तान-भारत या ईरान-पाकिस्तान-भारत पाइपलाइन के प्रतिा बहुत सावधान रहने की जरूरत है। मध्य पूर्व -भारत डीप वाटर पाइपलाइन एक बेहतर विकल्प लगता है।
  8. भारत का तिब्बत कार्ड अब केवल प्रतीकात्मक महत्व का रह गया है। इसकी प्रभावशीलता कम से कमतर होती जा रही है। भारत को चीन की काट के रूप में ताइवान के साथ सक्रियता बढ़ानी चाहिकए। यह केवल कूटनीतिक कारणों से नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और टेक्नलजी के लिहाज से भी जरूरी है।
  9. चीन हिंद महासागर में घुस गया है, इसलिए दक्षिण चीन सागर में अधिक सक्रिय भूमिका।
  10. CPEC में चीन की महत्वाकांक्षाओं को विफल कर देना।

‌निष्कर्ष

नई विश्व व्यवस्था में अपनी विशिष्ट स्थि‌ति के कारण भारत एक बड़ी शक्ति है। भारत को चाहिए कि वह चीन की रणनीतिक चालबाजियों पर नजर रखे और वन बेल्ट रोड एनिशिएटिव (OBOR) का हिस्सा न बने।

भारत को मेक-इन-इंडिया जैसे रणनीतिक और आर्थिक पहलों को प्रोत्साहन देने के लिए खुद के व्यापार लिंक विकसित करने चाहि-एं और संचार के लिए समुद्री लाइनों को खोलना चाहि ए।

– राजीव गुप्ते

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